यह बात कोई भी प्रतिपक्षी स्वीकार कर सकता है, कि आज भी भोजन की जो मर्यादा वैष्णवों में—उनमें भी खासकर श्री सम्प्रदाय में प्रचलित है, यह शास्त्रोक्त आदर्श के सर्वाधिक निकट है, क्योंकि पीछे हमने भोजन के जो प्रधान चार नियम प्रकट किये हैं, वे उक्त सम्प्रदाय में अभी तक अक्षुण्ण चले आते हैं। भोजन को भगवत्सेवा समझना, अभक्ष्य भक्षण से दूर रहना दृष्टिदोष से बचने का विशेष ध्यान रखना और भगवान् को अर्पण करके तत्प्रसादरूपेण ही उसे स्वीकार करना,—उक्त नियमों के पालन का प्रत्यक्ष फल श्री सम्प्रदाय के समुद्धारक यतिवर्य श्री रामानुजाचार्य महाराज के जीवन चरित्र में समुपलब्ध हो सकता है। आप ही एक मात्र ऐसे धर्माचार्य हुये हैं, जिन्होंने कि कांची से काशमीर तक श्रीसम्प्रदाय की विजय वैजयन्ती फर्राते हुये और प्रस्थानत्रयी पर अखण्ड भाष्य रचकर जहां शारीरिक और मानसिक उभयविध परिश्रम सहन में क्षमता की पराकाष्ठा कर दिखाई, वहाँ इस कलिकाल में भी १२० वर्ष की पूर्णायु भोगकर स्वेच्छा से वैकुण्ठ को प्रस्थान किया। उक्त प्रघट्ट के लेखन में किसी सम्प्रदाय विशेष की प्रशंसा करना मात्र हमें अभीष्ट नहीं, किन्तु अन्यान्य सभी लोग भोजन सम्बन्धी नियमों का आग्रह पूर्वक पालन करते हुए दीर्घायु बन सकें यही हमारा अभिप्राय है।