सम्भव है पाठक हमारी इस द्रौपदी के चीर के समान लम्बायमान भोजन भूमिका को पढ़कर यह अनुभव करने लगें कि आखिर हम भुक्त भोगियों के सामने इस सर्वविदित दैनन्दिनी घटना का औपन्यासिक भाषा में वर्णन करने का क्या तात्पर्य ? परन्तु हम सावधान कर देना चाहते हैं, कि मानव समाज की इस नित्य की भयंकर भूल से किस प्रकार उत्तरोत्तर जगत् के स्वास्थ्य और आयु का स्तर गिरता जा रहा है—यह उपेक्षा का विषय नहीं है।

निःसन्देह उपर्युक्त रीति से खाए गए भोजन द्वारा जहाँ स्वास्थ्य का सत्यानाश होता है वहाँ अन्न का भी अपव्यय होता है। यह समस्या एक दृष्टान्त द्वारा जल्दी समझ में आ सकती है। कल्पना करो किसी न्यायालय में अनेक नौकर काम देते हैं। दो सेवक हैं, जो नित्य प्रातःकाल कमरे को झाड़ते बुहारते हैं। गर्मी में छिड़काव करते हैं और सर्दी में अंगीठी दागते हैं। एक पंखा कुली है, एक गुलदस्ते सजाने वाला माली है, एक आवाज लगाने वाला चपड़ासी है, एक लेखक है—ये सब लोग यथायोग्य अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। यहाँ एक विचारपति न्यायाध्यक्ष है जिसे अमुक घटना को सुनकर और समझकर अन्तिम निर्णय पर केवल हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। न्यायालय का काम ठीक चल रहा है। अब कदाचित् सब नौकर हड़ताल पर हों, न्यायपति को ही झाड़ू बुहारी से लेकर हस्ताक्षर पर्यन्त सब काम अपने हाथ से करना पड़े तो वह कितने दिन कार्य कर सकता है। आखीर उसे भी त्यागपत्र देना ही होगा। इसी प्रकार हमारे भोजन कार्यालय में भी अनेक सेवक हैं और उन सबके पृथक् २ कर्तव्य हैं, नेत्र भोजन का रूप देखते हैं—मक्खी बाल कोई हेय वस्तु नहीं है यह परीक्षण करते हैं। हाथ उष्णता की जांच करता है—कि भोजन कहीं अत्युष्ण तो नहीं है। [चम्मच से खाने वाले कई आधुनिक बाबू शीघ्रतावश गरमागरम मोहनभोग मुंह में डालने की भूल कर बैठते हैं, जब मुंह दग्ध होने लगता है; तो उसे लज्जा के मारे बाहिर तो उगलते नहीं झट अन्दर गुटक जाते हैं। जिससे गला मेदा सब भस्म होते चले जाते हैं।] दांत उसको खूब कुचल-कुचलकर पिठ्ठी बना देते हैं। जिह्वा खूब रसास्वादन लेकर उसमें अधिकाधिक स्वनिस्सृत जल मिला देती है। इस इस प्रकार यदि सब सेवकों द्वारा पूरी तरह अपना-अपना कर्तव्य पालन करने के बाद भोजन का ग्रास आमाशय में पहुँचता है, तो जाठराग्नि रूप न्यायाधीश को केवल हस्ताक्षर रूप पाचन मात्र करना पड़ता है, परन्तु यदि इसके विपरीत दांतों से उनका काम न लेकर और जीभ से उसका काम न लेकर ग्रास को शीघ्रता से आमाशय में ठूंस दिया जाता है, तो बिना चबाए मोटे-मोटे अन्नांश के नानाविध रसों से भरपूर होने के कारण जाठराग्नि को ही सब कृत्य करने के लिए विवश होना पड़ता है। जैसे जज कुली का काम नहीं कर सकता, इसी प्रकार जाठराग्नि दांतों का काम नहीं कर सकती।

रस और अन्न का विश्लेषण करना जीभ का काम है, जैसे कागजों को छांटकर फायल करना रीडर का काम होता है। यदि यह भी न्यायाधीश को ही करना पड़े तो परिणाम यह होता है कि इधर यथावत् काम न लेने से जहाँ दांत समय से पूर्व अस्तीफा दे देते हैं, वहाँ कुछ दिन के बाद जाठराग्नि भी त्यागपत्र दे बैठती है। इस तरह सभी स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। यह प्रत्यक्ष है, कि हम अपने जिस अंग से उसका काम न लेंगे वह शिथिल पड़ जाएगा। उस अंग का रक्त प्रवाह बन्द हो जायगा और जिस अंग से आवश्यकता से अधिक काम लेंगे वह भी जवाब दे जाएगा। तपश्चर्या के नाम पर हाथ न हिलाने वाले कई हठी भिखमंगों का जड़प्रायः सूखा हुआ हाथ हमने आंखों देखा है, और स्टुडियों की चकाचौंध के आधिक्य से समय से पूर्व अन्धे हुए सिनेमा के नट और नटिये सचमुच रात में टिमटिमाने वाले स्टार=तारे ही बने सर्वत्र देखे जा सकते हैं। इसलिए इस प्रकार की स्वाभाविक भूल से बचने का एक मात्र उपाय ठाकुर जी को भोग लगाना है।

भोजन सामने आते ही ज्योंही मनमें उत्कण्ठा का भयंकर तूफान उत्पन्न होने लगा, कि भोक्ता उसके पनपने से पूर्व ही दोनों आंखें बन्द करके यथोचित मन्त्र श्लोक पढ़ते हुए भगवद्ध्यान में तल्लीन हो गया। मनकी वृत्ति भोजन की जिघृक्षा के तुच्छ लाभ में न रह कर भगवान् के लोकोत्तर प्रेमरस में डुबकियें लेने लगी। त्वरा और जल्दबाजी को निष्ठा का डण्डा दिखाकर रफूचक्कर कर दिया। यदि पंक्ति भोजन हुआ तो 'सहस्रशीर्षा' के लम्बेपाठ द्वारा जहाँ तत्रस्थ वातावरण को सत्वगुणमय बनाने का पुनीत कृत्य सम्पन्न हुआ, वहाँ समस्त पंक्ति के सामने सम्यक् सब पदार्थ पहुँचने का भी अपेक्षित समय मिल गया। इसी बीच यदि देर से आने वाले सज्जन भी आ पहुँचे, तो सब काम ठीक ठाक हो गया, कोई अवांछित काण्ड होने की सम्भावना नहीं रही। अब जब कि दूध के उफान सरीखा मन का वह उमड़ता हुआ तूफान शान्त हो गया, तो अब बड़े २ ग्रास बिना चबाए, बिना रसास्वादन लिए अन्दर ठूसने की प्रवृत्ति अपने आप बन्द हो गई। जब यथावत् पूर्वोक्त रीति से अन्न का सूक्ष्मांश रस रसना को प्राप्त हुआ और स्थूलांश आमाशय में पहुँचा, तो इस रस विश्लेषणात्मक कृत्य के कारण जीभ थोड़े ही भोजन में परितृप्त हो गई अन्न थोड़ा खाया गया परन्तु तृप्ति खूब हुई।