भोजनोपरान्त थोड़ी देर शनैः-शनैः घूमना चाहिये, शास्त्र में लिखा है कि—'भुक्त्वा शतपदं गच्छेत्' अर्थात्—भोजन खाकर कम से कम सौ कदम चलना चाहिये ऐसा क्यों करना चाहिये ?—इसका सहेतुक विवेचन भी सुस्पष्ट लिखा है। यथा

भुक्त्वोपविशतः स्थौल्यं शयानस्य रुजस्तथा।
आयुश्चंक्रममाणस्य, मृत्युर्धावति धावतः॥

अर्थात्—भोजन करते ही बैठ जाने में शरीर स्थूल हो जाता है, तत्काल सो जाने से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। चहल कदमी करने से आयु बढ़ती है और भागने से मौत का खतरा बढ़ता है।

गद्दे तकियों पर बैठने वाले अनेक मारवाड़ी सेठ कार्याधिक्यवशात् भोजनोपरान्त तत्काल पुनः बैठ जाने के कारण प्रथम नियम का उल्लंघन करके भीमकाय तुंदिल प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। तत्काल सो जाने पर अजीर्ण रोग हो जाता है—यह बात कोई भी शङ्काशील महाशय स्वयं किसी दिन अनुभव करके देख सकता है।

कहना न होगा कि—'सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मलाः' के अनुसार समस्त रोगों का मूल, एक मात्र मलों का प्रकोप है जो अजीर्ण से ही उत्पन्न होता है। भोजन खाकर भागने से तत्काल दर्द होने लगता है, क्योंकि सद्यो-भुक्त भोजन जब तक आमाशय में ठीक-ठीक सुव्यवस्थित न हो जाए तब तक भाग दौड़ करना खतरे से खाली नहीं। इसलिये उक्त तीनों चेष्टायें न करके शनैः शनैः चंक्रमण करना ही आयुवर्द्धक है यह कोई भी समझदार प्रत्यक्ष अनुभव कर सकता है।