चंक्रमण के बाद भोक्ता को बांई करवट से लेटना चाहिये—ऐसी शास्त्र की आज्ञा है यथा—

वामपार्श्वेण संविशेत्।

अर्थात्—भोजनानन्तर बांई करवट से विश्राम करना चाहिये।

हम प्राणायाम प्रकरण में यह प्रकट कर आये हैं, कि मनुष्य के शरीर में नासिका के जो दो छेद हैं, उनमें क्रमशः बांया चांद है और दांया सूर्य है। अपने-अपने नामानुसार यह दोनों शरीर में ठण्डक और गर्मी का तारतम्य ठीक रखते हैं। यह बात प्रत्यक्ष देखी जा सकती है, कि बांई करवट से लेटने पर दांया=सूर्य स्वर चलने लगता है और इसी प्रकार दांई करवट से लेटने पर स्वभावतः बांये=चन्द्र स्वर से श्वास आने लगता है। सो भोजन के परिपाक के लिये जाठराग्नि का उद्दीप्त होना अभिप्रेत है। इसलिये बांई करवट लेटने से ही लाभ हो सकता है।