शास्त्र में मल मूत्र त्याग और स्नान भोजन के सम्बन्ध में कुछ ज्ञातव्य विशेष नियम लिखे हैं यथा—
सन्देहेऽपि द्वयं कुर्य्यात्सन्देहेऽपि द्वयं नहि।
कुर्य्यान्मूत्रपुरीषे द्वे, न कुर्य्यात्स्नान-भोजने॥
(शिष्टस्मृति)
अर्थात्—स्वास्थ्य में गड़बड़ी होने के समय 'करूँ या न करूँ'-ऐसा सन्देह हो जाने पर दो काम करने चाहिये और दो काम न करने चाहिये, यदि मल मूत्र के त्याग की शङ्का हो तो वे दोनों त्याग ही देने चाहियें। परन्तु यदि स्नान और भोजन में विचिकित्सा हो तो ये दोनों काम नहीं करने चाहिये।
कारण सुस्पष्ट है, कि आलस्यवश मल मूत्र के निरोध में तो रोग उत्पन्न हो जाने की सम्भावना है, परन्तु त्यागने की दशा में शौच की शङ्का न होने की अवस्था में भी किसी प्रकार की हानि की सम्भावना नहीं। ठीक इसी प्रकार अजीर्ण खट्टी डकार और अरुचि होने पर भी जिह्वालौल्यवश पुनरपि भोजन ठूंस लेने की दशा में तथा सर्दी जुकाम ज्वरांश होने पर भी स्नान करने की अवस्था में तो रोग बढ़ने की सम्भावना है, न करने पर कोई खतरा नहीं।