दुर्भाग्यवश यवनों के संसर्ग से पवित्र भारत में भी मार्गभ्रष्ट कुछ हिन्दू युवक बिना लांग की धोती बांधना, जिसे म्लेच्छ भाषा में 'तहमद' या तम्बा भी कहते हैं—फैशन समझने लगे हैं। खासकर जब से पश्चिमी पंजाब से उपद्रुत हिन्दू लाखों की संख्या में यत्र तत्र सर्वत्र भारत के नगर ग्रामों में पहुँचे हैं, तो वे भावों में कट्टर हिन्दू होते हुए भी वेश भूषा में तम्बा बांधे खरे खासे शेख का स्वांग बनाए फिरते हैं, जिसका दुष्प्रभाव इधर के लोगों पर भी पड़े बिना नहीं रहा। इसलिये कुछ दिन से मुक्त कक्ष हिन्दुओं की बाढ़ सी आ गई है। परन्तु शास्त्र में आर्य पुरुष के लिए 'मुक्त कक्ष' रहना महा पाप बतलाया है हैं यथा—

मुक्तकक्षस्तु यो विप्रो भूमौ चलति पादतः।
पदे पदे सुरापान-फलं भवति निश्चितम्॥
(शिष्टस्मृति)

अर्थात्—जो विप्र='हिन्दूमात्र का उपलक्षण' मुक्तकक्ष=धोती की लांग लगाये बिना पैदल घूमता है, उसे कदम २ पर मद्य पान का पाप लगता है।

उपर्युक्त आदेश में 'भयानक' वचन द्वारा इस अनार्य-संस्कृति सूचक पाप से बचने की आज्ञा दी गई है। कहना न होगा कि प्रायः मद्यपान करने वाले लोग ही उन्मत्त होकर इस प्रकार कपड़े संभालने की सुध बुध भुलाकर घूमा करते हैं। इसलिए प्रत्येक आस्तिक हिन्दू को इस अहिन्दू वेश से बचे रहना चाहिए। इस आदर्श के पालन में दक्षिण भारत और खासकर बंगाल के सज्जनों का आचरण अनुकरणीय है—जो पंचकक्षा धोती बांधकर हिन्दू संस्कृति की परम्परागत पुरातन मर्यादा का अभी तक अक्षुण्ण पालते करते आ रहे हैं।