'दक्षिण दिशा की ओर पांव करके नहीं सोना चाहिए।'—शास्त्र की इस विज्ञानपूर्ण आज्ञा को हिन्दू घरों की ठेठ देहातों में रहने वाली अपठित देवियां भी खूब जानती हैं और वे चाहे इसका कुछ हेतु न जानती हों तब भी धर्म के नाम पर तत्परतापूर्वक उसका पालन करती हैं। परन्तु इसका हेतु क्या है यहां उसी का संक्षेप में दिग्दर्शन कराते हैं।

कुछ समय पूर्व आधुनिक वैज्ञानिक सूर्य को स्थिर और पृथ्वी को उसके चारों ओर घूमने वाला पिण्ड मानते थे, परन्तु नई खोज करने पर विदित हुआ कि सूर्य भी अपनी ही केन्द्र कील पर घूमता है—अतः मध्ययुग में यही माना जाता रहा—परन्तु अब साम्प्रतिक अभिनव खोज में यह सिद्ध हो गया कि सूर्य न केवल अपनी केन्द्र कील पर ही घूम रहा है, किन्तु वह समस्त सौर जगत् को अपने साथ लिए किसी अनिश्चित दिशा की ओर भी प्रगतिशील है। इसलिए हमारा यह ब्रह्माण्ड प्रतिक्षण नये से नये आकाश में पहुँचता रहता है। कहना न होगा कि साध्यकोटि के ये सब अनुभव अधूरे हैं। अभी वास्तविक सिद्धान्त तक पहुँचने में उन्हें कुछ काल और लगेगा परन्तु क्रान्तदर्शी ऋषियों ने वेद की दूरबीन से उक्त सब विषयों को 'इदमित्थं' देखकर बतलाया है, कि जैसे समस्त सौर जगत् सूर्य के आकर्षण पर सुस्थिर है, ठीक इसी प्रकार सूर्य भी 'ध्रुव' नामक महापिण्ड के आकर्षण पर आधारित है।

वर्तमान वैज्ञानिक आज सूर्य की जिस कक्षा को 'अनिश्चित दिशा' मान रहे हैं हमारे यहाँ वह अनन्त सहस्राब्दियों पूर्व सुनिश्चित हो चुकी है—ऐसी स्थिति में सर्वतन्त्र सिद्धान्त है, कि सौर जगत् ध्रुव के आकर्षण पर अवलम्बित है, सो वह 'ध्रुव' उत्तर दिशा में स्थित है। यदि कोई व्यक्ति दक्षिण दिशा को पांव और ध्रुव की ओर मस्तक करके सोएगा तो ध्रुवाकर्षण के तारतम्य से पेट में पड़ा 'भोजन,—पचने पर जिसका अनुपयोगी अंश मल के रूप में नीचे की ओर जाना आवश्यक है—वह ऊपर की ओर गतिशील हो जायगा। इससे हृदय, फुप्फुस और मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। जिस मस्तिष्क को निर्मल और स्वस्थ बनाने के लिये शयन किया जा रहा है उस पर उल्टा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए दक्षिण दिशा की ओर पांव करके नहीं सोना चाहिए। इसके विपरीत यदि हम उत्तर दिशा की ओर पांव करके सोयेंगे तो जहां भोजन परिपाक ठीक होगा, वहाँ ध्रुव के आकर्षण से दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रगतिशील विद्युत् प्रवाह हमारे मस्तक से प्रविष्ट होकर पांवों के रास्ते से निकलेगा। इस तरह प्रातः जगने पर मस्तिष्क विशुद्ध वैद्युत् परमाणुओं से परिपूर्ण एवं सर्वथा स्वस्थ हो जाएगा।

ध्रुव के आकर्षण को प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए किसी भी जलपोत=स्टीमर में लगी कम्पास की चुम्बक की सुई को देखा जा सकता है—जो सदैव ध्रुव की ओर ही रहती है और अनन्त जल राशि में चलते हुए जहाजों को ठीक २ दिशा बतलाती है। कुछ घड़ियों की चैन में भी छोटा सा ध्रुव दर्शक यन्त्र रहता है, उसे बाएं दाएं यथेच्छ घुमाने पर भी सुई की नोक सदैव ध्रुव की ओर ही रहती है। इसलिए दक्षिण की ओर पांव करके नहीं सोना चाहिए।

शयनकाल से सम्बन्धित 'गर्भाधान' आदि कृत्यों को संस्कार प्रकरण में निरूपण किया जाएगा इस प्रकार प्रातः जागरण से लेकर शयन पर्यन्त—समस्त अहोरात्रचर्या का सांगोपांग वर्णन करते हुए, हम इस अध्याय को यहीं समाप्त करते हैं।