संस्कारों का प्रारम्भ कब से हुआ ? इस विषय में कहा जा सकता है, कि मानव जाति के प्रारम्भ काल में ही मनुष्य की यह संस्कारमयी भावना व्यक्त रूप धारण कर चुकी होगी। ऐतिहासिकों का कथन है कि 'एक समय ऐसा अवश्य रहा होगा जब यूरोप एशिया अमेरिका आदि सम्पूर्ण देशों में फैले हुये मनुष्यों के पूर्वज एक ही स्थान में रहते थे, उनका आपस में बड़ा प्रेम तथा भाई चारा था, वहीं से उन्होंने सभ्यता तथा संस्कृति का विकास प्रारम्भ किया और विभिन्न स्थानों की ओर फैलते गये'। यह विचार अधिकांश में सत्य प्रतीत होता है। और तब हम निर्विवाद रूप से कह सकते हैं, कि उस सभ्यता-संस्कृति-शिक्षा-शून्य, क्रूर एवं हिंसक मानव-पशु को,—सभ्य, सुशिक्षित, तथा शान्ति-प्रिय मनुष्य बनाने में इन वैदिक संस्कारों का महत्त्वपूर्ण भाग रहा है, क्योंकि यह निश्चय है, कि एकत्र निवास करने वाली मानव जाति के मेधावी पूर्वपुरुषों=ऋषियों—ने ईश्वरीय ज्ञान स्वरूप वेदत्रयी के साक्षात्कार के साथ ही संस्कार प्रणाली का न केवल ज्ञान प्राप्त किया किन्तु उसे अपनाया भी। यह आदि मानव जाति, ब्रह्मा की सृष्टि वेदी * धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र से ज्यों ज्यों इधर उधर फैली वह अपने साथ इन संस्कारों को—जो कि उस समय तक धार्मिक कृत्यों का अङ्ग बन चुके थे—भी अपने साथ लेती गई और आज हम देखते हैं, कि यद्यपि विशुद्ध रूप में नहीं किन्तु विकृत रूप में ही सही संस्कारों की यह परम्परा सर्वत्र मिलती है। हिन्दु, मुसलमान, सिक्ख, पारसी, यहूदी, ईसाई आदि सभी जातियों में और भारत चीन जापान अरब मिश्र यूरोप आदि सभी देशों में जातकर्म नाम-करण, विवाह, अन्त्येष्टि आदि मुख्य मुख्य संस्कार किसी न किसी रूप में अवश्य पाये जाते हैं। यद्यपि इनका विशुद्ध रूप तो वैदिक ज्ञान की उत्तराधिकारिणी आर्य जाति में ही देखने को मिलता है।
* टिप्पणी.—'आदि सृष्टि कहां हुई ?' यह विवेचन हमारे 'पुराण-दिग्दर्शन' ग्रन्थ में द्रष्टव्य है।