संस्कारों की सबसे अधिक आवश्यकता आज है। आज जब हम एक विश्वसंघ की कल्पना कर रहे हैं—एक ऐसे संघ की जिसकी छाया में रहने वाले सब नागरिक समान होंगे कोई ऊँचा नीचा न होगा; तो ऐसे अवसर पर हमें उन संस्कारों को पुनर्जीवित करना होगा, जिनमें इस प्रकार की उदात्त तथा प्राञ्जल भावनाओं का विशेष स्थान है।

इस समय सर्वत्र मानवता की पुकार है। जाति, वर्ण, धर्म, परम्परा और संस्कृति आदि के पुरातन महत्त्व का स्थान मानवता ग्रहण कर रही है। वर्ग भेद की तथाकथित अशान्ति से उत्पीड़ित मनुष्य, आज केवल 'मानव' बनकर विश्व के सम्पूर्ण मनुष्यों से भाई चारा तथा एकता स्थापन करना चाहता है। यह शुभ लक्षण हैं। यदि हम सच्चे अर्थों में मनुष्य बन जाते हैं, तो आये दिन धर्म जाति और राष्ट्र की संकुचित परिधि के नाम पर होने वाली अमानवीय घटनायें समाप्त हो जायें। किन्तु इसके लिये एक बार फिर सनातन धर्म की शरण में आना होगा। शारीरिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण उस सार्वभौम मानव की सृष्टि इन संस्कारों द्वारा ही होगी अन्यथा नहीं।

हमने पीछे कहा है, कि संस्कार सभी देशों और सभी जातियों में किसी न किसी रूप में सम्पन्न होते हैं, किन्तु एकता प्रेम तथा विश्व भ्रातृत्व का जो उच्च आदर्श हमें संस्कार पठित वैदिक मन्त्रों में देखने को मिलता है वह अन्यत्र नहीं।

वेदादि शास्त्रों में संस्कारों का बड़ा माहात्म्य प्रदर्शित किया है यहां तक, कि प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक अधिकार प्राप्त करने के लिये संस्कृत होना आवश्यक समझा गया है, द्विज माता पिता के शरीर से जन्म लेने के उपरान्त भी यदि बालक असंस्कृत हो तो वह द्विज नहीं कहला सकता। श्रुति ने संस्कार को जन्म के ही समान महत्त्व दिया है। 'द्विज' शब्द का अर्थ है जिसका दो बार जन्म हो। पहला मातृ-गर्भ से दूसरा संस्कार द्वारा। मानवजीवन का चरम लक्ष्य है—ब्रह्मत्व लाभ करना। इस लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले परमार्थ पथिक के लिये यह संस्कार एक स्फूर्तिप्रद पाथेय हैं—जिनके सम्बल से वह बिना भटके अपने मार्ग पर चला जाता है। मानव शरीर मानो एक चित्र है—जिसे कुशल कलाकार की तूलिका संस्कार रूपी अनेक रंगों से भरकर पूर्ण करती है। यदि वे न हों तो 'मानव' अधूरा है—केवल श्वासयुक्त एक पिण्ड मात्र! इसी लिये भगवान् अंगिरा ने कहा है—

चित्रं क्रमाद्यथानेकैरंगैरुन्मील्यते शनैः।
ब्राह्मण्यमपि तद्वत्स्यात्संस्कारैर्विधिपूर्वकैः॥

अर्थात्—जैसे अनेक प्रकार के रंगों को तूलिका द्वारा संयुक्त करके चित्र बन जाता है, इसी प्रकार विधिपूर्वक किए गए गर्भाधानादि संस्कारों से यह शरीर भी ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है।