पीछे बतलाया गया है, कि 'संस्कार' मानव प्रकृति का स्वाभाविक अंग है। किन्तु कैसे वह मानव प्रकृति का अंग बना इसके तीन कारण हैं। प्रकृति से प्राप्त होने वाली प्रत्येक वस्तु हमारे लिये उसी रूप में उपयोगी नहीं होती, उसमें कोई दोष होता है जिसे दूर करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। उपयोगी बनाने के लिये उसमें कुछ गुणों का सन्निवेश करना पड़ता है तथा उसकी कमियों को दूर करना भी जरूरी होता है। शब्दान्तर में हम कह सकते हैं १—दोष मार्जन, २—गुणाधान, ३—हीनाङ्गपूर्ति, इन तीन उद्देश्यों के लिये हम प्रत्येक वस्तु का विविध प्रकार का संस्कार करते हैं। खान से निकले हुए स्वर्ण को ही लीजिए। सुन्दर मणि-रत्न-जटित मुकुट बनाने के लिए उसे उपरोक्त त्रिविध संस्कारों में से गुजरना पड़ता है। खान में से निकलने पर वह मिट्टी आदि से मिला हुआ मैला कुचैला धातु खण्डमात्र होता है। न उसमें चमक, न सुन्दर छवि। उसे भट्टी में डालकर उसका दोष परिमार्जन होता है। अग्नि से उसका सम्पूर्ण मल दग्ध हो जाता है और एक दिव्य आभा तथा चमक से वह जगमगा उठता है। इसके अनन्तर स्वर्णकार अनेक प्रकार से घड़कर उसे मुकुट का रूप देता है। यह गुणाधान है। उसकी रही सही कमी को मणि रत्नादि से जटित करके पूरा कर दिया जाता है। इस प्रकार त्रिविध संस्कारों के सम्पन्न हो जाने पर वह स्वर्णखण्ड एक रत्न जटित राजमुकुट के रूप में परिणत हो जाता है।
दूसरा उदाहरण कमीज का लीजिये। प्रकृति ने कपास को जन्म दिया है, किन्तु क्या वह उसी रूप में हमारे लिए उपयुक्त सिद्ध हो जाती है, नहीं। मनुष्य अनेक क्रियाओं द्वारा उसके दोषों को दूर कर उसे कपड़े का रूप देता है। तब दर्जी उस कपड़े को काट छांटकर कमीज के रूप में परिवर्तित कर देता है। बटन वगैरह से संयुक्त करके उसकी अन्तिम कमी पूर्ण की जाती है और वह एक अत्युपयोगी परिधान बन जाता है।
जब संसार की सभी वस्तुयें इन त्रिविध संस्कारों द्वारा सम्पन्न होकर ही पूर्णता को प्राप्त होती हैं, तो मानव जैसा सर्वश्रेष्ठ प्राणी माता पिता से गर्भ से, ही 'मनुष्य' रूप में उत्पन्न हो' या उसे किसी संस्कार की आवश्यकता ही न हो यह बात नितान्त असम्भव है। इसलिये मनुष्य की जन्मजात इन कमियों को दूर करके सभ्यसमाज के लायक पूर्ण मनुष्य बनाने के लिए संस्कारों का होना अत्यावश्यक है। वैदिक संस्कारों के भी पूर्वोक्त तीन ही उद्देश्य हैं और तीन ही विभाग। गर्भाधान, जातकर्म, अन्नप्राशन, आदि द्वारा गर्भवासजन्य मलिनता आदि दोषों का परिमार्जन होता है। चूडाकर्म उपनयन आदि द्वारा मनुष्य में शिक्षा तथा चारित्रिक विकास का सृजन करके गुणाधान क्रिया निष्पन्न होती है और विवाहादि द्वारा हीनाङ्गपूर्ति की जाती है। इसीलिए संस्कारों का वर्गीकरण करते हुए मनु जी ने लिखा है—
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकञ्चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्॥
गर्भाद् भवेच्च पुँसूतेः पुँस्त्वस्य प्रतिपादनम्।
निषेकफलवज्ज्ञेयं फलं सीमन्तकर्मणः॥
गर्भाम्बुपानजो दोषो जातात् सर्वोऽपि नश्यति।
आयुर्वर्चोऽभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहृतेस्तथा॥
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः।
सूर्यावलोकनादायुरभिवृद्धिर्भवेद् ध्रुवा।
निष्क्रमादायुःश्रीवृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः।
अन्नाशनान्मातृगर्भमलाशादपि शुध्यति॥
बलायुर्वर्चोवृद्धिश्च चूडाकर्मफलं स्मृतम्।
उपनीतेः फलं त्वेतद् द्विजतासिद्धिपूर्विका॥
वेदाधीत्यधिकारस्य सिद्धि ऋषिभिरीरिताः।
पत्न्या सहाग्निहोत्रादि तस्य स्वर्गः फलं स्फुटम्॥
ब्राह्माद्युद्वाहसम्भूतः पितृणां तारकः सुतः।
विवाहस्य फलं त्वेतत् व्याख्यातं परमर्षिभिः॥
अर्थात्—गर्भाधान संस्कार से बीज तथा गर्भ सम्बन्धी सम्पूर्ण मलिनता नष्ट हो जाती है और क्षेत्र रूपी स्त्री का संस्कार भी हो जाता है। इस गर्भ से पुत्र ही उत्पन्न हो इस अभिप्राय से 'पुंसवन संस्कार' होता है। 'सीमन्तोन्नयन' का फल गर्भाधान संस्कार की भांति गर्भ की शुद्धि है। जातकर्म संस्कार द्वारा माता के खान पान सम्बन्धी समस्त दोष दूर किये जाते हैं। नामकरण संस्कार से आयु तथा तेज की वृद्धि और लोक व्यवहार में नाम प्रसिद्ध होने से अपना पृथक् अस्तित्व कायम होता है। निष्क्रमण संस्कार में शिशु को समन्त्रक जगत्प्राण भगवान् सूर्य का दर्शन कराया जाता है, जिससे आयु तथा लक्ष्मी की वृद्धि होती है। अन्नप्राशन द्वारा मातृ गर्भ में मलिनता भक्षण से जो दोष उत्पन्न हो जाते हैं उन्हें शान्त किया जाता है। बल आयु तथा तेज की वृद्धि ही चूडाकर्म संस्कार का फल है। उपनयन से बालक 'द्विज' की श्रेणी में आ जाता है और उसे वेदाध्ययन का अधिकार मिल जाता है। विवाह के अनन्तर सपत्नीक अग्निहोत्रादि अनुष्ठान द्वारा स्वर्गलाभ होता है, और ब्राह्मादि उत्तम विवाह के फल से सुपुत्र उत्पन्न होकर जीवित पितरों की सेवा तथा मृत पितरों के लिये श्राद्ध तर्पणादि द्वारा उनका उद्धार करता है—यह सब विवाह संस्कार का फल है।
स्मृतिकारों ने प्रत्येक संस्कार का जो फल निर्देश किया है, उसकी वास्तविकता एवं वैज्ञानिकता पर हम अगली पंक्तियों में विचार करेंगे, किन्तु यहां इतना कह देना अप्रासंगिक न होगा, कि संस्कारों के इस महत्व को भुलाकर ही हमने अधोगति को प्राप्त किया और आज यदि हम वस्तुतः उन्नत होना चाहते हैं, तो हमें संस्कार प्रणाली को पुनर्जीवित करना होगा। भारतीय इतिहास के उज्ज्वल रत्न—राम, कृष्ण, वेदव्यास बुद्ध रामानुजाचार्य और शंकराचार्य जैसे आदर्श पात्रों की सृष्टि इसी संस्कार परम्परा का फल था।