उल्लिखित भूमिका के बाद हम इस विवेचन में प्रवृत्त होते हैं, कि संस्कारों की संख्या कितनी है। इस विषय में स्मृतिकारों के भिन्न-भिन्न मत पाये जाते हैं। किन्हीं स्मृतिकारों ने ४० संस्कार माने हैं, किन्हीं ने २५, और कुछ ने १६। महर्षि गौतम ने ४० संस्कार माने हैं और महर्षि अङ्गिरा ने २५। भगवान् वेदव्यास जी ने १६ संस्कारों को ही मान्यता दी है, यथा—

गर्भाधानं पुँसवनं सीमन्तो जातकर्म च।
नामक्रियानिष्क्रमणोऽन्नाशनं वपनक्रिया॥
कर्णवेधो व्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः।
केशान्तं स्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः।
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराः षोडशः स्मृताः।

अर्थात्—१—गर्भाधान, २—पुंसवन, ३—सीमन्तोन्नयन, ४—जातकर्म, ५—नामकरण, ६—निष्क्रमण, ७—अन्नप्राशन, ८—चूडाकर्म, ९—कर्णवेध, १०—यज्ञोपवीत, ११—वेदारम्भ, १२—केशान्त १३—समावर्तन १४—विवाह, १५—आवसथ्याधान, १६—श्रौताधान—यह १६ संस्कार हैं।

मनुस्मृति में १३ ही संस्कारों का विधान है। उपरिलिखित संस्कारों में से पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, कर्णवेध, वेदारम्भ, आवसथ्याधान और श्रौताधान इन छः संस्कारों का मनुस्मृति में विधान नहीं हैं, किन्तु वानप्रस्थ, सन्यास, अन्त्येष्ठि इन तीन नवीन संस्कारों का सन्निवेश है।

आश्वलायन गृह्यसूत्र में १—विवाह, २—गर्भालम्भन, ३—पुंसवन ४—सीमन्तोन्नयन, ५—जातकर्म, ६—नामकरण, ७—अन्नप्राशन, ८—चूडाकर्म, ९—उपनयन, १०—समावर्तन, ११—अन्त्येष्ठि—इन ११ ही संस्कारों का उल्लेख मिलता है।

इसी प्रकार पारस्कर गृह्यसूत्र में १२ संस्कारों का वर्णन है। आश्वलायन में वेदारम्भ और निष्क्रमण का उल्लेख नहीं था। पारस्कर गृह्यसूत्र में वह मिलता है। मनु के वानप्रस्थ सन्यास और अन्त्येष्टि इन तीन संस्कारों का पारस्कर गृह्यसूत्र में उल्लेख नहीं है। इन तीनों को सम्मिलित कर देने पर यह संख्या १५ पर पहुँच जाती है।

मीमांसा दर्शन में कुछ हेर-फेर से व्यासप्रोक्त सोलह संस्कार का ही समर्थन उपलब्ध होता है। हम इन सबका यथा सम्भव समन्वय करके निम्नलिखित मुख्य १६ संस्कारों का ही इस अध्याय में विवेचन करेंगे। यथा—गर्भाधान, पुँसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, वानप्रस्थ, सन्यास, अन्त्येष्ठि।