विश्व की प्रत्येक वस्तु अपने रूप में पूर्ण और शिव है। मनुष्यों के हित के लिये ही उनका निर्माण हुआ है, किन्तु फिर भी संसार की सभी वस्तुओं को अच्छी या बुरी—इन दो श्रेणियों में विभक्त किया ही जाता है। यह विभाग पात्रापात्रमूलक ही हो सकता है। घी एक शक्तिप्रद पौष्टिक खाद्य है, किन्तु वह सभी प्रकार के मनुष्यों के लिए हितकर नहीं हो सकता। 'आयुर्वै घृतम्'—के अनुसार जो घृत सामान्यावस्था में मनुष्य को बल और शक्ति प्रदान करके दीर्घायु का कारण होता, अतिसार ज्वर तथा कास के रोगी के लिए वही घृत सद्यः मृत्यु का कारण बन जाता है। इसी प्रकार दही एक सुन्दर और स्वादिष्ट पदार्थ है, पदार्थ—विज्ञान के अनुसार वह स्निग्ध, हृद्य एवं ओजप्रद है, किन्तु उसके यह गुण तभी तक है, जब तक वह कांसी कांच मिट्टी या पत्थर के किसी पात्र में रखा जाता है—तांबे या पीतल के बर्तन में पड़कर वह विकृत हो जाता है और यदि उसका सेवन किया जाय तो तुरन्त जी मचलाकर वमन हो जाना स्वाभाविक होगा।
तात्पर्य यह है कि संसार की प्रत्येक वस्तु के लिए पात्रापात्र का विचार है और अधिकारी भेद से ही उसकी व्यवस्था की गई है, शास्त्रकारों ने लोक की भांति वैदिक प्रक्रियाओं में भी इसी नियम का आदर किया है। यों तो संस्कारों में मनुष्य मात्र का अधिकार है क्योंकि उनका उद्देश्य—सर्वांगपूर्ण मानव सृष्टि—सभी मनुष्यों पर लागू होता है, किन्तु फिर भी महर्षियों ने अधिकारी भेद से एक व्यवस्था निश्चित की है। श्री याज्ञवल्क्य महर्षि ने लिखा है—
ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रा वर्णास्त्वाद्यास्त्रयो द्विजाः।
निषेकादिश्मशानान्तास्तेषां वै मन्त्रतः क्रियाः।
शूद्रोऽप्येवंविधः कार्यो विनामन्त्रेण संस्कृतः॥
अर्थात्—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन द्विज वर्णों को गर्भाधान से श्मशान पर्यन्त सब संस्कार मन्त्रपूर्वक करने चाहिए और शूद्रों को बिना मन्त्र।