वर्तमान युग में समस्त संघर्षों का एक मात्र मूल 'अधिकार' हैं, अमुक कहता है मुझे यज्ञोपवीत गले में डालने का अधिकार क्यों नहीं ? तो दूसरा चिल्लाता है मुझे वेद पढ़ने का अधिकार क्यों नहीं ? तीसरा कहता है मुझे दण्ड धारण पूर्वक सन्यास आश्रम में प्रवेश करने का अधिकार क्यों नहीं ?—धार्मिक जगत् में जैसा यह 'अधिकार' का द्वन्द्व चल रहा है, ठीक इसी प्रकार आर्थिक जगत् में भी मजदूर और मिल मालिक में, किसान तथा भूमिधर में—विद्यार्थी और शिक्षक वर्ग में, शास्य एवं शासक में अन्ततोगत्वा पत्नी और पति में—गर्ज है आज अधिकार के नाम पर यत्र तत्र सर्वत्र अवाञ्छनीय देवासुर संग्राम मचा हुआ है। त्रिकालज्ञ महर्षियों ने अधिकारवाद को अनर्थ मूलक समझकर समाधि में अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा परम कारुणिक भगवान् के निःश्वासभूत वेदों में कर्तव्यवाद के दर्शन किये। अधिकारवाद संघर्ष जन्य अनेक अनर्थों से उपप्लुत मानव समाज यदि आज अधिकारवाद की रट छोड़कर कर्तव्यवाद के दृष्टिकोण से समस्त उलझी हुई समस्याओं को समाहित करने के लिये उद्यत हो जाए तो संसार का चित्र ही बदल जाय।
यदि हम क्षणमात्र के लिये भी अधिकारवाद के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं—तो 'कम परिश्रम अधिक लाभ' की स्वाभाविक मानव प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है, जो सर्व अनर्थों की मूल है। यह प्रवृत्ति जहाँ सामाजिक संगठन के लिये विघातक है वहाँ राष्ट्र की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी रोड़ा अटकाने वाली सिद्ध होती है। इसलिये आर्य शास्त्रों में समस्त कार्यकलाप का विभाजन अधिकार के आधार पर नहीं, किन्तु कर्तव्य पालन के आधार पर किया गया है, जैसे वेद पढ़ने का ब्राह्मण को अधिकार नहीं, किंतु उसके कन्धों पर यह भार है, कि वह भूखा रहकर भी वेद पढ़े। क्षत्रिय को रणभूमि में सर काटने का अधिकार नहीं, किन्तु वह देश जाति धर्म की रक्षा के लिये शिर कटाये—यह उसके मस्तक पर ईश्वर निहित भार है। अधिकार और भार का विश्लेषण करते हुए यह बात समझ लेनी चाहिये, कि अधिकार के प्रयोग में अधिकारी स्वतन्त्र होता है परन्तु भार तो न चाहते हुए भी कर्तव्य वशात् धारण करना ही पड़ता है। यही कारण है, कि ब्राह्मण जाति ने सुदामा की भांति दारिद्र्य जीवन सहर्ष बिताते हुये भी आज के इस युग में भी वेदों की पठन पाठन प्रणाली को अक्षुण्ण रखा है।
विगत दिनों में यह प्रत्यक्ष देखते हुए भी, कि इंगलिश पढ़े लिखे डाक्टर, प्लीडर इञ्जनियर आदि मालामाल हो रहे हैं, लाखों संस्कृतज्ञ विद्वानों ने जान बूझकर अपने पुत्रों को भी अपनी तरह आर्थिक संकटमय जीवन बिताने के लिये केवल कर्तव्य पालन भार की दृष्टि से ही उस उपेक्षित मार्ग का पथिक बनाया। यवन शासनकालीन राजपूतों के वे केसरिया बाना पहनकर किए गए साके, केवल भार के आधार पर विभाजित कर्तव्य के कारण ही हुए हैं। इसलिये अनर्थकारी अधिकारवाद की दृष्टि से ही समस्त कार्यकलाप को देखने की प्रवृत्ति को छोड़कर उसे कर्तव्य पालन—भार—की दृष्टि से ही मनन करने की आदत डालनी चाहिये।
सो उक्त संस्कारों की भी इति कर्तव्यता के विषय में किसको ? कब ? कैसे ? क्या ? करना चाहिए। यह सब बात केवल शास्त्रों से ही पूछनी चाहिये, शास्त्र जिसे जो कहे वह उसे वैसे कर डाले। जिसे न कहे, वह भूलकर भी उसे करने की चेष्टा न करे। जैसे शास्त्र से आदिष्ट अमुक कार्य न करने पर पाप होता है ठीक इसी प्रकार शास्त्र से अनादिष्ट कार्य करने पर भी महापाप होता है। सैनिक या पुलिस मैन के लिए जैसी वेषभूषा निर्धारित है यदि वह 'ओन ड्यूटी' होता हुआ वैसी न पहिने, तो जैसे राजा के निकट वह व्यक्ति दण्डनीय होता है वैसे ही साधारण नागरिक यदि पुलिस मैन का स्वांग बनाकर भोले भाले देहातियों पर रौब गांठे तो वह भी प्रतारणा विषयक धोखा देही की ४२० धारा के मातहत दण्डनीय होगा। इसलिये जिन द्विजाति पुरुषों के लिए अमुक अमुक संस्कार समन्त्रक करने बताये हैं यदि वे न करेंगे तो पाप भागी बनेंगे और जिन द्विजेतर पुरुषों के लिये जो संस्कार अमन्त्रक करने की किंवा सर्वथा न करने की ही छूट दे रक्खी है, वे यदि तद् विरुद्ध आचरण करेंगे तो पातकी अवश्य होंगे।
हमारे यहां कर्मलाप का विभाजन तो वर्ण और आश्रम के तारतम्य से कर्तव्य पालन के आधार पर हुआ है, परन्तु कर्मफल जन्य अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति आब्राह्मण आचाण्डाल सब को समान रीति से होती है।
अधिकार और अनधिकार से किये गए कर्म के बाह्य रूप में प्रत्यक्ष दृष्ट चाहे कुछ अन्तर मालूम न होता हो, परन्तु पुण्य पाप के तारतम्य से तज्जन्य अदृष्ट फल में महान् अन्तर पड़ता है, जैसे एक अनधिकारी पुरुष रात दिन भी 'पकड़ो! मारो! फाँसी दे दो' पुकारे तो किसी का बाल बांका नहीं होता, परन्तु यदि यही शब्द शासक की कुर्सी पर बैठा निर्णायक एक बार भी कहे तो तदनुसार अमुक को मृत्युदण्ड और अमुक को पुरस्कार दिया जाता है। यहां दोनों व्यक्तियों के शब्दों और वाक्यों में कुछ अन्तर नहीं, केवल अधिकार का ही अन्तर है। पहिले व्यक्ति को उन्मत्त पागल दीवाना कहकर उपहासपात्र समझा जाता है और दूसरे को न्यायाधीश शासक तथा जज कहकर सम्मानित किया जाता है। आशा है हमारी इस छोटी सी पृष्ठ भूमिका से पाठक संस्कारों की इतिकर्तव्यता का सामञ्जस्य समझने में कृतकार्य हो सकेंगे।