यद्यपि प्रत्येक संस्कार की अपनी २ विभिन्न अनुष्ठेय प्रक्रियायें हैं, किन्तु गणपत्यादि पूजन तथा गृह्य होम प्रत्येक संस्कार के आवश्यक आरम्भिक कृत्य हैं। इससे पूर्व कि हम गर्भाधानादि पृथक् २ संस्कारों पर विचार करें यह आवश्यक प्रतीत होता है, कि संस्कारों के इन सामान्य कृत्यों पर ही पहिले विचार किया जाय। इनमें भी गणेश पूजन का विषय तो इतना विवादास्पद और आलोच्य बन गया है, कि बुद्धिवादी युग के बड़े २ लिक्खाड़ महाशयों को भी अपनी कलम कुठार सम्भालकर मैदान में उतरना पड़ा है। गणेश को अनार्य एवं अवैदिक देवता सिद्ध करने के लिये बुद्धिवादियों द्वारा दी गई युक्तियों के प्रवाह में आस्तिक हिन्दू समाज की श्रद्धावल्लरी आज डूबती उतराती नजर आ रही है। इसलिए क्यों न इस अध्याय में वर्णित मानव चर्या का श्रीगणेश इन सामान्य कृत्यों से ही किया जाए।