(आदौ गणपतिं वन्दे विघ्ननाशं विनायकम्)

श्रीगणेश जी महाराज का—प्रत्येक शुभाशुभ कार्य के आरम्भ में आस्तिक हिन्दू समाज, पूजन वन्दन एवं ध्यान अपना परम कर्तव्य समझता है। योगी याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में लिखा है कि—

एवं विनायकं पूज्यं ग्रहांश्चैव विधानतः।
कर्मणां फलमाप्नोति श्रियं चाप्नोत्यनुत्तमाम्॥
(याज्ञवल्क्य स्मृति आचाराध्याय २९२)

अर्थात्—पूर्वोक्त विधि के अनुसार गणपति की पूजा करके विधि पूर्वक नव ग्रह पूजन करना चाहिये, जिसमें समस्त कार्यों का फल प्राप्त होता है तथा लक्ष्मी की भी प्राप्ति होती है।

कोई ऐसा कार्य नहीं, जो कि गणपति पूजन के बिना आरम्भ किया जाता हो। इस अटल नियम की पालन प्रणाली के प्रताप से संस्कृत साहित्य में तो 'श्रीगणेश' शब्द की 'शक्ति' ही आरम्भार्थ में आरूढ़ हो गई है। हिन्दी भाषा में भी न केवल गणेश पूजन में निष्ठा रखने वाले आस्तिक सज्जन ही—अपितु 'तुन्दिल पेट' और 'हाथी की नाक' कहकर कहकहे लगाने वाले अपटूडेट महाशय भी 'श्रीगणेश' पद को प्रारम्भकता सूचक—'मुहावरा' स्वीकार करते हैं और बड़े धड़ल्ले के साथ किसी भी आन्दोलन का प्रशंसात्मक बखान करते हुए यही उचरते हैं, कि “जब से इस आन्दोलन का 'श्रीगणेश' हुआ है, तब से मृतप्राय हिन्दू जाति में पुनः जीवन आ गया है” इत्यादि। कहना न होगा कि 'श्रीगणेश' शब्द का आरम्भिक क्रिया के साथ कुछ न कुछ अनिवार्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध अवश्य है, जिससे कि—“अस्मात्पदादयमर्थो बोधव्य इत्याकारक ईश्वरसंकेतः शक्तिः' के अनुसार यह शब्द प्राकृतिक रीति से 'प्रारम्भ' अर्थ में आरूढ़ हो गया है।

गणेश शब्द के 'विघ्नहन्' 'विनायक' 'गजास्य' 'इप्सितदाता' और 'विघ्न-शमन' आदि अनेक पर्य्याय प्रसिद्ध हैं। संस्कृत भारती विश्व भर की प्रचलित भाषाओं की जननी है तथा समस्त भाषाओं में संस्कृत भाषा के शब्द ही अपभ्रष्ट होकर समाविष्ट हुए हैं—यह नग्न सत्य प्रायः सभी अनुसन्धायक स्वीकार करते हैं। तदनुसार अन्यान्य भाषाओं में भी आरम्भार्थक जितने प्रसिद्ध शब्द हैं वे सब प्रायः 'गणेश' शब्द के पर्य्यायों में से ही किसी एक के अपभ्रंश जान पड़ते हैं। जैसे—इंगलिश भाषा का प्रारम्भार्थक 'बिगनिंग' शब्द गणेश शब्द के अन्यतम पर्याय 'विघ्नहन्' का अपभ्रंश प्रतीत होता है। इबरानी पर्सियन और उर्दू भाषा के 'आगाज' 'इप्तदा' 'बिशमिल्ला' आदि शब्द भी हमारे 'गजास्य' 'इप्सित दाता' 'विघ्न-शमन' शब्दों के ही अपभ्रंश हैं। इस तरह विश्व साहित्य पर व्यापक दृष्टि डालने से यही परिणाम निकलता है, कि शब्द-शास्त्र की परम्परा के विचार से गणेश तत्त्व का आरम्भिक क्रिया के साथ अनादिकाल से अविच्छिन्न सम्बन्ध चला आता है।