गणेश-पूजन की प्रथा केवल भारत में ही नहीं, प्रत्युत विश्व के सभी देशों में पाई जाती है। बौद्ध-धर्म के महायान के तान्त्रिक सम्प्रदायों ने भी अपने यहां 'विनायक' की कल्पना करके उसे महत्वपूर्ण स्थान दे रखा है। पिछली शताब्दियों में कई बौद्ध-प्रदेशों के अन्दर विनायक रूप में बुद्ध की कल्पना प्राप्त होती है। बौद्ध ग्रन्थों में बुद्ध का एक नाम 'विनायक' भी मिलता है। उनके यहां 'वज्रधातु' और 'गर्भधातु' के रूप में भी विनायक पूजन का प्रचुर प्रचार है।
नेपाल में बौद्ध-धर्म के साथ-साथ 'हेरम्ब' और 'विनायक' नाम से गणपति पूजा सर्वत्र पाई जाती है।
चीन में गणेशमूर्ति दो नामों से विख्यात है, एक 'विनायक' और दूसरा 'कांगीनेन'। उस देश में अन्य देवों की अपेक्षा विनायक पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। 'नृत्यगणपति' की पूजा भी इस देश में विशेष रूप से पाई जाती है।
जापान—इतिहास से ज्ञात होता है कि 'कोबो दाइशी' नामक सुप्रसिद्ध विद्वान् ने चीन के बौद्धाचार्यों से शिक्षा लेकर ९ वीं शताब्दी में अपने यहां विनायक पूजन प्रचलित किया था। अब तो वहां के 'शिङ्गोन' सम्प्रदाय ने भी इस पूजा पद्धति को अपना लिया है।
तिब्बत—के प्रत्येक मठ के अधिरक्षक के रूप में गणेश की पूजा पाई जाती है।
बर्मा, स्याम—प्रदेशों में भी गणपति पूजा प्रचलित है। उस देश में कांस्यधातु की गणेशमूर्त्ति सर्वप्रिय समझी जाती है।
कम्बोडिया—में स्थानीय ख्मेरकला के कारण वहाँ के गणपति मूर्तियों में विशेष परिवर्तन पाया जाता है।
जावा—में प्रायः गणेश के स्वतन्त्र मन्दिर नहीं होते, प्रत्युत शिवमन्दिर में ही उनकी पूजा होती है। शँकर के सदृश वहां के गणेश भी गले में मुण्डमाल पहने हुए पाए जाते हैं।
बोर्नियो—तथा बालद्वीप में भी गणपति पूजन का विशेष प्रचार है।
अमरीका—में लम्बोदर गणेश की मूर्ति मिलती है। इस प्रकार की मूर्ति का उल्लेख श्री चम्मनलाल ने 'हिन्दु अमरीका' नामक अपनी पुस्तक में विस्तृत रूप से किया है। सन् १४९२ में 'कोलम्बस' द्वारा अमरीका के आविष्कार होने के पूर्व भी वहां गणेश, सूर्य आदि देवताओं की मूर्तियाँ उपलब्ध हो चुकी थीं। इससे यह निश्चित है कि भारतीयों ने ईसवी सन् से बहुत वर्ष पूर्व अमरीका में भी अपना उपनिवेश स्थापित कर रखा था।
भिन्न २ देशों में गणपति पूजन भिन्न २ नामों से पाया जाता है। श्रीमती 'ए गेट्टी' (A getty) ने गणेश पूजन पर एक विस्तृत पुस्तक लिखी है, जो सन् १९३६ में 'आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी' से प्रकाशित हो चुकी है। उस ग्रन्थ में विदुषी गेट्टी ने तामिल भाषा में गणेश का नाम 'पिल्लैय', भोट भाषा में 'सोग्सदाग', बर्मी में महा पियेन्ने', मंगोलियन में 'त्वोत् खारुन् खागान्', कम्बोडियन में 'प्राहकेनीज्', चीनी में 'कुआन्-शी-तियेन्' और जापानी भाषा में 'कागिनेन्' इन नामों का उल्लेख किया है। निःसन्देह उत्तरीय मंगोलिया से लेकर दक्षिणी बाली तक और जापान से लेकर अमरीका तक यह गणेश-पूजन-पद्धति जिस किसी रूप में प्रचलित है।