(एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति)
हिन्दू धर्मावलम्बी आदि काल से एक मात्र परमात्मा की ही उपासना करते हैं जो लोग हिन्दू धर्म पर यह आक्षेप करते हैं “कि हिन्दू लोग एक ईश्वर को छोड़कर अनेक देवी देवताओं और यहां तक कि धातु, पत्थर, मिट्टी आदि जड़ वस्तुओं की पूजा करते हैं”—वे मनुष्य सर्वथा भ्रांत हैं क्योंकि उनके तंग और शुष्क मस्तिष्कों में हिन्दूधर्म का विशाल रहस्य समा नहीं सकता। वास्तव में अनेक नामों और रूपों द्वारा की जाने वाली साम्प्रदायिक उपासनाएँ अन्त में एकेश्वरवाद में ही परिणत हो जाती हैं। हम यह रहस्य एक दृष्टान्त द्वारा अभिव्यक्त करते हैं।
एक नगर में एक विलक्षण मनुष्य रहता था। उसका नाम विश्वरूप था। जो संस्कृत का दिग्गज विद्वान्, अंग्रेजी का एम ए कानून में 'बार एट्ला' और डाक्टरी में सिविलसर्जन था। साइन्स में प्रौढ़ता रखने के कारण उसे 'डाक्टर ऑफ सायन्स' की पदवी मिली थी। फौजी खिदमात से सन्तुष्ट होकर सरकार ने उसको 'टाइगर आफ वर्ल्ड' का खिताब प्रदान किया था। गवैयों में उसकी बड़ी भारी धाक जमी थी, सब कहते थे कि यह तो दूसरे तानसेन उत्पन्न हुवे हैं, तान, टप्पे, पलेट, आरोह सम और तार—गर्ज है कि गान कि प्रत्येक कला में ये अद्वितीय हैं।—एक ताल, तीन ताल झपताल, लक्ष्मीताल और दुर्गाताल एवं चंचर, धमार, कहरुवा, बजारा आदि वादन की समस्त पद्धतियों में माहिर हैं।
अनेक पहलवान इसके चेले थे। यह अपने अखाड़े के पट्ठों को एड, झिन्नी, कुलाजंग, पलटा, चौपट और कन्वर के दांव पेचों में ऐसा फरवट करता था, कि मुकाबले में जेबस्को सरीखे विश्वविजयी पहलवान भी, आन की आन में चारों खाने चित्त हो जाते थे। 'रुस्तमे हिन्द' की गदा इसने इसीलिए ठुकरा दी थी कि वह सिर्फ हिन्दुस्थान का 'रुस्तम' कहलाने में अपना अपमान समझता था।
नदिया शान्ति के नैय्यायिक उसे अपना गुरु मानते थे, उस दिन 'नीलो घटः' पर धारा प्रवाह शास्त्रार्थ सुनकर विद्वन्मण्डल ने उसको 'अभिनव वाचस्पतिः' की उपाधि दी थी।
काशी के 'टिड्ढाणआचार्य्य' तो हमारे प्रतिपाद्य नायक को 'फांकी' फांकते हुवे देखकर 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' के उदाहरण बन जाते थे। उस दिन दशाश्वमेध घाट पर 'आमीति न्यासे ह्रस्वग्रहण वैयर्थ्यम्' के शास्त्रार्थ में सब ने एक स्वर में कहा था कि 'जो है शो है आप तो 'व्याकरणीय-महाटवीय प्रखर-पञ्चाननोदाहरणभूत-पण्डित-प्रकाण्ड-मण्डली-मण्डनायमाण' हैं।
कहां तक वर्णन करें यह व्यक्ति प्रत्येक गुण में अद्वितीय था, सब विद्याओं का वेत्ता था, हर एक फन में माहिर था और तमाम मामलात में दखल रखता था।
एक दिन उसी नगर के रहने वाले 'शंका पंक पयोनिधि' महाशय शकूकचन्द साहिब आप से मुलाकात करने के लिये पधारे। इत्तिफाक से उस वक्त हमारे चरित नायक अपने निवास गृह में विद्यमान थे, महाशय जी 'नमस्ते' फटकार कर आज्ञानुसार एक तर्फ बैठ गये। उसी समय विश्वरूप जी के पुत्र ने आकर कहा 'पिता जी! प्रणाम, आपको घर बुला रहे हैं।' महाशय शकूकचन्द ने अपनी डायरी निकाली और यह समझ कर—चूंकि आगत सज्जन ने आपको 'पिता जी' शब्द द्वारा सम्बोधित किया है इसलिये हो न हो, इँ जनाब का नाम 'पिता जी' है—झट से आज की तारीख वाले पन्ने पर 'पिता जी से मुलाकात' यह शब्द नोट कर लिये।
विश्वरूप जी घर जाते हुवे महाशय जी से शिष्टाचार पूर्वक कहते गए कि आप यहीं तशरीफ रखिएगा मैं अभी २ लौटकर आता हूँ। विश्वरूप जी को पीठ मोड़े देर न हुई थी एक कत्थक सज्जन—तम्बूरा थामे दर्वाजे पर आ धमके और पूर्वस्थित महाशय शकूकचन्द जी से पूछने लगे कि—'गायनाचार्य्य जी किधर गए?' शकूकचन्द जी ने आश्चर्यचकित होते हुवे उत्तर दिया—'जनाब! यह तो 'पिता जी' का मकान है, यहां कोई गायनाचार्य्य नाम का व्यक्ति नहीं रहता। कत्थक ने समझ लिया, कि यह कोई पागल मनुष्य है अतः कुछ भी उत्तर न देकर यथास्थान बैठ गया।
इतने में एक दूसरे साहब ने आकर पूछा बैरिस्टर साहब कहां गए? शकूकचन्द फिर बोल उठे—अजी जनाब! यह तो 'पिता जी' का घर है, क्या आप सभी भंग पीते हैं जो इसी दर्वाजे पर आकर दुनिया भर के मनुष्यों को दर्य्याफ्त करते हैं।' कत्थक ने कहा 'मवक्किल साहिब, बैठ जाइए बाबू जी अभी आ जाते हैं।' वह भी फर्श पर बैठ गया। आधी मिनट के बाद एक तीसरा व्यक्ति लठिया के सहारे कराहता हुवा आ पहुँचा और दम फूल जाने के कारण विस्वर कण्ठ से दबी आवाज में पूछने लगा 'डाक्टर साहिब कहां हैं'। कत्थक और मवक्किल अभी दयार्द्र होकर सान्त्वनामय उत्तर देने को तैयार ही थे कि महाशय जी झुंझला कर बोल उठे—'अरे भाई यह तो 'पिता जी का मकान है यहां टर फर कोई नहीं बसता।' महाशय जी के मूर्खता पूर्ण उत्तर से बीमार को क्रोध तो बहुत आया परन्तु कत्थक के सान्त्वना पूर्ण हाथ के इशारे से आराम कुर्सी पर टेक देकर बैठ गया। इतने में एक विद्यार्थियों का झुण्ड बगल में पुस्तकें दबाए आ पहुँचा, कोने में बिछी चटाई पर बैठते हुवे पूर्वावस्थित सज्जनों को सम्बोधित करते हुए पूछने लगा—श्री 'गुरुदेव जी' कहाँ पधारे हैं? महाशय जी की लीला देखने के लिए अन्य सब सज्जन चुप रहे। शकूकचन्द जी कुछ तो पहिले से ही जले भुने बैठे थे परन्तु विद्यार्थियों के प्रश्न से [यह समझ कर कि ये सभी लोग मुझ से मसखरी करने की सलाह करके आये हैं तभी तो एक के बाद दूसरा चिढ़ाने के लिए आकर बेहूदे प्रश्न करता है।] आगबबूला होकर गर्ज उठे—नालायक कहीं के! कौन होते हैं 'गुडद्योजी'? दश बार समझा चुका हूँ कि यह तो 'पिताजी' का मकान है। मगर तुम शरारत से बाज नहीं आते। चिड़िया घर की तरह सभी जानवरों का यही ठेका लिया है? जो हर एक मनुष्य को यहीं आकर दर्याफ्त करते हो! क्या यह इन्क्वयरी आफिस (Enquiry office) समझा है? महाशय जी की बड़बड़ाहट का अखण्ड पाठ समाप्त होता न देखकर विद्यार्थियों की सहनशीलता जवाब दे गई। आखिर स्वभाव सुलभ वानर-चाञ्चल्य के कारण उन्होंने महाशय शकूकचन्द को जा दबोचा और लगे मीठी-मीठी चुटकियों से मरम्मत करने। जब सिर पर तड़ातड़ पड़ी तब कहीं महाशय जी की अक्ल ठिकाने आई, छोतसो झड़ाकर चुप रह गए। मन-ही-मन सोचने लगे कि मैं पागल हूँ या ये सब?
तत्काल श्री विश्वरूप जी भी वहां आ पहुँचे, समस्त उपस्थित मनुष्यों ने अपने-अपने ढंग से सत्कार करना आरम्भ किया। प्रत्येक विद्यार्थी ने श्रीचरणों में मस्तक झुकाते हुए अपने दाएं हाथ से गुरुजी के दाएं पांव को तथा बायें से बायें पांव को स्पर्श करते हुए नाम-गोत्र-निर्देशपूर्वक कहा—'अभिवादयेऽहं भो?' बीमार मुहम्मडन ने कहा 'आदाब अर्ज जनाब?' ईसाई मवक्किल ने कहा—'गुड मार्निंग सर!' महाशय जी ने भी सीना उभारे तनेतनाए दूर से ही ढेले की तरह जोर से 'नमस्ते' दे मारी, और आंसू पोंछते हुवे पूछा—श्रीमान् जी! मैं जानना चाहता हूँ, कि आपका शुभ नाम क्या है? श्री विश्वरूपजी ने कहा कि इस साढ़े तीन हाथ के कलेवर का नामकरण संस्कार के समय तो 'विश्वरूप' नाम रक्खा गया है परन्तु अब सब सज्जन अनेक प्रकार सोपाधिक नामों से पुकारते हैं। पुत्र मुझे 'पिताजी' कहते हैं। धर्मपत्नी 'पतिदेव' कहती है। शिष्य लोग 'गुरुजी' पुकारते हैं। मरीज 'डाक्टर साहिब' बोलते हैं। मवक्किल 'वकील' कहकर याद करते हैं, गर्ज है कि जितने मुँह उतने नाम! आपने आज 'श्रीमान् जी' यह एक नया नाम रख छोड़ा है।
श्री विश्वरूप जी की इस उक्ति को सुनकर महाशय जी का समस्त सन्देह मिट गया और अपनी मूर्खता पर पश्चात्ताप करते हुए उपस्थित प्रत्येक सज्जन से क्षमा याचना करने लगे।
ठीक यही दृष्टान्त उन बुद्धि के हिमालयों पर घटित होता है जो कि—एक ही ईश्वर की अनेकों नाम रूपों द्वारा की जाने वाली विभिन्न समुदायों की विभिन्न पूजा पद्धतियों का रहस्य न समझ कर हिन्दूधर्म पर अनेकेश्वरवाद का मिथ्या लाञ्छन लगाने का प्रयास करते हैं।
परमात्मा एक है परन्तु वही अनेक गुणों का भण्डार है—अगणित शक्तियों का केन्द्र है। अनन्त लीलाओं का अथाह सागर है इसलिए 'अनाम' होते हुये उसके अनेक नाम हैं और 'अरूप' होते हुए भी उसके असंख्य रूप हैं तभी तो वेद कहता है—
'एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'
अर्थात्—ज्ञानी लोग उस एक ही परमात्मा का अनेक तरह से बखान करते हैं।
जिस प्रकार एक ही व्यक्ति के तत्तद् सम्बन्ध विशेष से एवं तत्तद् गुण वैशिष्ट्य से पिता पुत्र माता और गायक मल्ल आदि अनेक नाम पुकारे जाते हैं तथापि उसके एकत्व में कोई अन्तर नहीं पड़ता, ठीक इसी प्रकार एक ही ईश्वर को अपनी २ भावना विशेष के तारतम्य से अनेक नामों द्वारा प्रतिपादन करने वाले हिंदूधर्म के 'एकेश्वरवाद' पर भी कुछ आक्षेप नहीं आ सकता।
गान कला सीखने के अभिलाषी शिष्य गायक गुरु की प्रशंसा में यही स्तुति करेंगे कि—'आपका गला अतीव कोमल है और हाथ की अंगुलियें इतनी हलकी हैं कि हारमोनियम बाजे पर पानी की तरह थिरकती हैं इत्यादि'। परन्तु मल्लविद्या सीखने वाले शिष्य इसी गुरु की प्रशंसा में उपर्युक्त कोमलता और हलकापन न कहकर इसके विपरीत यह कहेंगे कि—'आपके भुजदण्ड हाथी के सूंड के समान सुडौल और अतीव प्रचण्ड हैं, कहना न होगा कि प्रत्येक मनुष्य अपने प्रयोजन के अनुसार तदुपयुक्त शब्दों द्वारा ही दूसरे की स्तुति करता है। ऐसा कौन मूढ़ अपराधी होगा जो कि अदालत के समक्ष अपना अपराध सिद्ध हो जाने पर भी जज को 'इंसाफ पसन्द' कहकर स्वयं सजा भुगतने को उतावला होगा, किन्तु उस समय तो 'रहम दिल' कहकर दया की भीख मांगने से ही अपना प्रयोजन एक सीमा तक सिद्ध किया जा सकता है। इसी प्रकार एक ही ईश्वर को शान्ति अभिलाषी मनुष्य 'शान्ताकार भुजगशयनम्' कहकर स्मरण करते हैं। वीरत्व शक्ति के चाहने वाले बहादुर 'सिंहादुत्थाय कोपाद् घघड़घडघडा धावमाना भवानी' कहकर याद करते हैं। धनसंपदा के मुतलाशी महाजन 'हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्' पुकारते हुए ध्यान करते हैं और समस्त विघ्न-बाधाओं की निवृत्ति चाहने वाले आस्तिक 'विघ्नेश्वर सकलविघ्नहर नमामि' कहते हुये पूजते हैं।