गणेश गायत्री में लिखा है कि—

तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्ती प्रचोदयात्।

अर्थात्—हाथी के समान मुखवाले—वक्रतुण्ड और एकदांत वाले गणेश का हम मनन और ध्यान करते हैं वह हमें सन्मार्ग में प्रवृत्त करें।

प्रत्यक्ष में भी गणेश की प्रत्येक मूर्ति का कण्ठ से ऊपर का भाग हाथी का होता है। नराकृति अर्वाङ्ग के साथ हाथी के मस्तक का मेल मानव बुद्धि को चकित कर दे यह स्वाभाविक ही है, इसके आधिदैविक स्वरूप का रहस्य तो आगे चलकर पौराणिक कथाभाग के समाधान के समय प्रकट किया जायगा; यहाँ हम कथित बुद्धिवादी सज्जनों के सन्तोषार्थ—'दुर्जन तोष' न्याय से स्वयं भी बुद्धिवाद के आजाद घोड़े पर सवार होकर दो चार दुलत्तियें फटकारने के लिए उसे चाबुक की नोक से चौंक देते हैं। अस्तु,

वर्तमान युग में किसी भी घटना का रहस्य प्रकट करने के लिए समाचार पत्रों में व्यंग्य-चित्र=कार्टून प्रणाली का आश्रय लिया जाता है। यद्यपि उक्त चित्र देखने में बड़े ही अटपटे जान पड़ते हैं, इनमें मनुष्यों को पशु पक्षी कीट पतंगों की विकृत आकृतियों में सर्वथा असम्भव स्वरूपों में, अंकित किया जाता है परन्तु इनसे घण्टों मगज पच्ची करने पर भी ध्यान में न बैठने वाले भाव, समाचार पत्रों के कई कालम पढ़ने पर भी न सुलझने वाले रहस्य विनोद विनोद में तत्काल आंखों के आगे नाचने लगते हैं, देहली के सुप्रसिद्ध व्यंग्यचित्रकार श्री शंकर अपनी कला में बड़े निपुण माने जाते हैं, उनका एक साप्ताहिक पत्र 'शंकर वीकली' कार्टूनमय निकलता है, जिसे बड़े बड़े पत्रकार खरीदते हैं, अन्य देशों में तो ऐसे २ कार्टून सहस्रों पौण्ड कीमत में बिकते हैं यह प्रसिद्ध है। एतावता टेढ़ीमेढ़ी रेखाओं से उचित समस्या का रहस्य समझने के बजाय यदि कोई जीवट जीव उसकी बनावट के असम्भवपन का रोना रोने लगे तो विज्ञजनों की दृष्टि में वह महाशय (?) उक्त कला से सर्वथा अनभिज्ञ और बुद्धि का शत्रु ही समझा जायगा, फिर चाहे वह बुद्धिवादी होने के सैंकड़ों प्रमाण-पत्रों के बण्डल का बोझा उठाए अहर्निश घूमा करे। ठीक इसी प्रकार गणेश भगवान् के विलक्षणरूप को देखकर कोई नास्तिक अपने आपको ही एकमात्र सम्भावना का निर्णायक व्यर्थ मानता हुआ तादृश स्वरूप से ली जा सकने वाली शिक्षाओं से वंचित रह जाए तो यह उसका दुर्भाग्य ही समझना चाहिए। इसलिए हम पिछली किश्त में बुद्धिवादियों को यही बतलाना चाहते हैं कि गणेश को तुम कार्य में निर्विघ्नता चाहने वालों के लिए शिक्षाप्रद रेखाचित्र ही समझ लो—कल्पना करो—तुम यह रहस्य जानना चाहते हो कि—हमारे किसी कार्य में कोई विघ्न बाधा उपस्थित न हो, एतदर्थ हमें स्वयं क्या प्रयत्न करने चाहिए। यह बात तो निर्विवाद सिद्ध है कि हमारे कार्यों में जो विघ्न उपस्थित होते हैं उनके मूल में कुछ हमारी ही भूलें लापरवाहियें, अनुचित चेष्टायें एवं गलत फहमियाँ होती हैं, यदि हम सचमुच सावधान हो जायें और तादृश चेष्टाओं की पुनरावृत्ति न होने दें तो निस्सन्देह हमारे सब काम विघ्न बाधाओं से प्रतिहत न होंगे।

शिर—जब हमने भगवान् वेदव्यास सदृश मनोविज्ञान के पारगत किसी कलाकार के सामने अपना उपर्युक्त हार्द प्रकट किया तो उन्होंने शब्द चित्रमयी अतुल तूलिका उठाकर तादृश चित्र का निर्माण आरम्भ करते हुए सबसे प्रथम हस्ती का मस्तक अंकित किया और कहा कि देखो तुम यदि अपने प्रत्येक कार्य में निर्विघ्नता चाहते हो तो अन्य किसी भी प्राणी से शिर भिड़ाने=टक्कर लेने की बुरी आदत को छोड़ दो, फिर चाहे तुम कितने ही वपुः-सम्पत्ति सम्पन्न क्यों न हो! यह शिक्षा संसार में केवल हाथी के मस्तक से ही ली जा सकती है क्योंकि संसार के अन्याय सभी प्राणियों का सर्वाधिक मर्मस्थान अण्डकोश होते हैं। हम मल्लों को सौ बार शिर भिड़ाते देखते हैं। छोटे २ बच्चे भी बाल लीला में प्रायः शिर भिड़ाते रहते हैं। भैंसे, सांड और मेंढों की शिरभिड़न्त तो बहुत प्रसिद्ध ही है, परन्तु इन सब जीवों के यदि अण्डकोशों पर थोड़ी भी चोट पड़ जाये तो विचलित हो उठते हैं। यदि शंकावादी महाशय को हमारी इस स्थापना पर कुछ भी सन्देह हो तो वे स्वयं अपने अण्डकोशों पर तनिक चुटकी चलाकर परीक्षा कर लें—सो संसार के अन्यान्य सभी प्राणियों के अण्डकोश जहां गुह्यांग के निकट होते हैं वहां प्रकृति ने हाथी के अण्डकोश उसके मस्तक में स्थापित किये हैं। पाठकों ने देखा होगा कि अन्यान्य जीवों की भांति हाथी के गुह्यांग के निकट अण्डकोश नहीं होते किन्तु मस्तक के ऊपर जो मटके-से औंधे उभरे हुए दीख पड़ा करते हैं वे वस्तुतः हाथी के अण्डकोश ही होते हैं, यही कारण है कि शरीर के अन्यान्य भागों की अपेक्षा इस भाग को अधिक मर्मस्थल समझकर महावत इसी स्थान पर अपना अधिकार रखता है। जो हाथी अन्य अंगों पर भालों के प्रहारों से भी इतना विचलित नहीं हो सकता वही महाकाय जीव उक्त अंग के ऊपर पांव के अंगूठे की चोक से और अंकुश के तनिक से संकेत पर महावत की इच्छानुसार नाचता है। सो अपने शिर को अन्यों की अपेक्षा अधिक मर्मस्थल समझकर व्यर्थ और अविवेकपूर्ण अनावश्यक संघर्ष में प्रवृत्त न होने की शिक्षा एकमात्र हाथी के मस्तक से मिल सकती है। इसलिए कोई भी कलाकार ऐसा शिक्षाप्रद रेखाचित्र निर्माण करते हुए उसका मस्तक हाथी का ही लगाने के लिए बाध्य है।