इसी प्रकार—'निर्विघ्नता के इच्छुक साधक को अपने नेत्रों को अर्थात्—दृष्टिकोण को कैसा बनाना चाहिए'—यह शिक्षा भी एकमात्र हाथी के नेत्रों से ही प्राप्त हो सकती है क्योंकि प्रकृति ने हाथी के नेत्रों को भी सब जीवों से विलक्षण बनाया है। जैसे दूरवीक्षण यन्त्र में आगे पीछे तो कांच लगे रहते हैं आगे का कांच छोटा होता है और पीछे वाला बड़ा, ठीक इसी प्रकार प्राणियों के नेत्र यन्त्र में भी सामने वाला काला तिल—जिसे कनीनिका कहते हैं, छोटा होता है और उसका पीछे का भाग उत्तरोत्तर बढ़ता चला जाता है। यही क्रम प्रायः समस्त प्राणियों के नेत्रों में पाया जाता है, परिणामस्वरूप सब जीव सामने की वस्तु को उतनी बड़ी देखते हैं जितनी कि वह वास्तव में होती है, परन्तु प्रकृति ने हाथी के नेत्र का निर्माण संसार के सब प्राणियों के नेत्रों से सर्वथा विपरीत किया है। जैसे सब प्राणी सूर्य्य के प्रकाश में खूब देखते हैं, परन्तु उलूक अपने शरीर के अनुपात से अधिक विस्तृत नेत्र-कनीनिका होने के कारण दिन में देख ही नहीं पाता, आंख चुंधिया जाने के भय से बन्द किये किसी सूखे पेड़ की खोह में दुबका रहता है, ठीक इसी प्रकार हाथी भी अपनी विपरीत कनीनिका के कारण सामने की छोटी वस्तु को भी बड़ी देखता है। जैसे ऐनक के शीशे के तारतम्य से हम सूक्ष्म अक्षरों को भी मोटे देखते हैं ठीक इसी प्रकार हाथी अपने नेत्र के विलक्षण निर्माण के कारण सामने खड़े साढ़े तीन हाथ के मनुष्य को भी अपने से ऊँचा देखता है, सम्भवतः प्रकृति ने हाथी के तादृश नेत्र इसलिए निर्माण किये हों कि यह पर्वतायमान प्राणी कदाचित् अपनी वपुः सम्पत्ति के अभिमान से अन्यान्य लघुकाय प्राणियों को कीटप्राय समझकर पांवों से रौंद डाले, इसलिए इन्हें सब अपने से बड़े दीखने चाहियें।

हमने उपर्युक्त रहस्य को जानने के लिए बहुत से हाथियों को सधाने वाले महावतों को पूछा है, उन्होंने उपर्युक्त बात का समर्थन करते हुए अधिक बतलाया है, कि हम नये नये हाथी के नेत्र में नीला थोथा आदि औषधियें इसलिए डालते हैं कि हाथी की दृष्टि कम हो जाए। यदि ऐसा न किया जाय तो यह सामने आने वाले अन्यान्य जीवों को अपने से बड़ा देखकर भय खाता है और ठीक नहीं चलता—सो अपने कार्य्य में विघ्न न चाहने वाले पुरुष को भी अपना दृष्टिकोण हाथी की भांति दूसरों को अपने से बड़ा देखने वाला बनाना चाहिए। मनुष्य जब दूसरों को तुच्छ समझकर उनका अपमान करता है किंवा अवहेलना=लापरवाही करता है तभी दूसरे लोग अपनी सम्मान संरक्षा के लिए उसे हृदय से सहयोग नहीं देते। सो दूसरों को अपने से बड़ा देखने की शिक्षा एकमात्र हाथी के ही नेत्रों से मिल सकती है इसलिए कोई भी कलाकार ऐसे रेखाचित्र में हाथी के ही नेत्र अंकित करने के लिए बाध्य है।