हमारे कार्य्यों में बहुत से विघ्न केवल इसलिए आ पड़ते हैं, कि हम कानों के कच्चे होते हैं, अर्थात् हमारे कान इतने छोटे किंवा ओछे होते हैं कि जहाँ किसी कर्णेजप=चुगलखोर निंदक ने झूठ सच आकर कहा कि—'तुम्हारा अमुक मित्र किंवा संबंधी 'यूं' कहता है'—बस! हम उस दुरात्मा को सत्यवादी हरिश्चन्द्र समझकर उधेड़-बुन में पड़ जाते हैं और इस प्रकार अपने बहुत से विश्वासपात्र सहयोगियों की उपेक्षा करने लग जाते हैं, अथवा जो सुना उसी की प्रतिक्रिया आरम्भ कर देते हैं। निःसन्देह हमारी यह चेष्टा अन्त में विघ्नरूप में परिणत हो जाती है सो अपने कार्य्य में विघ्न न चाहने वाले पुरुष को ओछे कान नहीं रखने चाहिए, किंतु अपने कानों को इतना विस्तृत बनाना चाहिए कि जिनमें सैंकड़ों असूयकों की विद्वेषपूर्ण बातें ऐसी समा जाएँ कि वे कभी जिह्वा के अग्रभाग पर आने ही न पाएँ। यह शिक्षा भी हाथी के सूर्पाकार कर्णों से ही ली जा सकती है, इसलिए मनोविज्ञान के चतुर चितेरे ने उक्त रेखाचित्र में कान भी हाथी के ही अंकित किये।