सब विघ्नों को दूर करने किंवा उसको बुलाने में जिह्वा का सर्वाधिक हाथ है। एक शब्द अनुकूल निकल गया तो बुराई पर तुला हुआ घोर शत्रु भी मोम बन गया, एक शब्द प्रतिकूल बोला गया, कि अपने पसीने के स्थान में खून बहाने वाला चिरविश्वस्त सम्बन्धी सदा के लिए शत्रु बन गया। कहा जाता है कि तलवार का घाव भर जाता है परंतु बोल का कांटा मृत्यु पर्य्यन्त कसकता रहता है। इसलिए अपने कार्य्य में विघ्न न चाहने वाले पुरुष को चाहिए, कि वह अपनी जिह्वा का नोकीला बाण दूसरों पर न तानकर उसका अग्रभाग अपनी ओर ही रक्खें अर्थात्—दूसरों को कुछ कहने से पूर्व 'स्वयं कितने पानी में हैं' यह आत्म-निरीक्षण भी कर ले। यह शिक्षा हाथी को छोड़कर संसार के अन्य किसी जीव की जिह्वा से नहीं ली जा सकती क्योंकि सभी जीवों की जिह्वा मनुष्य की भांति कण्ठ की ओर से आगे की ओर ही लपलपाती है परन्तु संसार में हाथी ही एकमात्र ऐसा जन्तु है, जिसकी जिह्वा प्रकृति ने दन्तमूल की ओर से कण्ठ की ओर लपलपाती लगाई है। सम्भव है पाठकों ने सौ बार हाथी देखने पर भी इस अद्भुत तथ्य को न जाना हो, वस्तुतः हाथी के मूँड का निर्माण संसार के समस्त प्राणियों से विलक्षणतम है ऐसी स्थिति में रेखाचित्रकार किसी विलक्षण जिह्वा से तादृश शिक्षा देने के लिए हाथी की ही जिह्वा लगाने के लिए आपाततः बाध्य है।