लोकोक्ति प्रसिद्ध है, कि 'हाथी के दांत खाने के और होते हैं और दिखाने के और होते हैं'—सो अपने कार्य्य में विघ्न न चाहने वाले पुरुष को चाहिए कि वह सज्जन पुरुषों के साथ जहां शिर भिड़ाने से बचे, उदार दृष्टिकोण से पेश आए, कुलोचित प्रतिष्ठा का पूरा ध्यान रक्खे, प्रसंगवश उनकी ओर से कही गई मानव-सुलभ ओछी बातों को भी अनसुनी कर दे और उनके गुण दोषों की आलोचना न करके अपनी ही निर्बलताओं पर ध्यान दे, वहां अकारण शत्रुओं की दुष्टता से बचने के लिए भी हाथी के खाने के दांतों की भांति अपने हृदय के अभ्यन्तरतल में उनके वास्तविक स्वरूप को समझते हुए और उससे सर्वदा सावधान रहते हुए भी अनावश्यक विरोध प्रकट न होने दे, किंतु दिखावे के दांतों की भांति ऊपर से मानवोचित लल्लोचप्पो बनी रहने दे, यह नीति है। यह शिक्षा भी हाथी के उभयविध दांतों से ही मिल सकती है, परन्तु यह नीति केवल महाभारत के शब्दों में—'मायाचारो मायया बाधितव्यः' के अनुसार 'एक' सीमा तक ही आचरणीय है, सर्वथा और सर्वदा अनुकरणीय नहीं, इसलिए हाथी का मुख होते हुए भी दिखावे का दांत केवल 'एक ही' चित्र में अंकित किया गया है इसलिए गणेश का अन्यतम नाम (एक दन्त) प्रसिद्ध है।
गणेश के एक दंत होने की कथा का रहस्य तो अन्यत्र प्रकट किया जाएगा परन्तु यहां इतना और भी अधिक जान लेना आवश्यक है, कि गणेश चित्र में दर्शनीय दांत केवल दायीं ओर का होता है बायीं ओर का नहीं होता जिसका तात्पर्य्य यह है कि बाह्य प्रदर्शन भी केवल दक्षिण=अर्थात्—चतुर श्रेणी के विप्रतिपक्षों के लिए ही उचित है—वाम=अर्थात्—स्वभावतः कुटिल कदर्य्यों का तो मनु के शब्दों में—'वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्' अर्थात्—वाणीमात्र से भी आदर नहीं करना चाहिए।
यहां तक—मस्तक से लेकर कण्ठ पर्य्यन्त हाथी के अङ्गों से प्राप्त होने वाली शिक्षाओं का दिग्दर्शन किया गया है; कहना न होगा, कि उक्त शिक्षाएं केवल हाथी के ही विलक्षण अङ्गों से ही प्राप्त हो सकती हैं। संसार के अन्य किसी प्राणी के अंगों को प्रकृति ने तादृश नहीं बनाया है इसलिए रेखा-चित्र कला कुशल कोई भी कलाकार कुल चित्र में हाथी का ही मस्तक लगाने के लिए बाध्य है।