गणेश का अपर पर्य्याय लम्बोदर भी है। लोक में किसी भद्रपुरुष के दैवात् विकृत हुए अंग का निर्देश करते हुए उसका नाम धरना अपमानजनक समझा जाता है, परन्तु गणेशभगवान् की उपर्युक्त नाम से स्तुति करना अनेक लाभों का हेतु है। उक्त नाम की व्याख्या तो यथास्थान की जाएगी, परन्तु यहां यह प्रकट कर देना आवश्यक है कि अपने कार्य में विघ्न न चाहने वाले साधक को एक प्रधान शिक्षा देनी अभी शेष थी जिसका सन्निवेश उक्त लम्बोदर आकृति में किया गया है, तद्यथा—संसार में दो प्रकार के मनुष्य पाये जाते हैं, एक वे हैं जो कि कुछ भी झूठी सच्ची बात सुन पाएँगे तो तत्काल उसे 'गेहे गेहे जने जने' गाते फिरेंगे। जब तक वे उस कच्ची पक्की बात का बिना वेतन लिए ही ढिण्ढोरा न पीट डालेंगे तब तक उनको भोजन भी हजम न होगा। ऐसे ही पुरुष अफवाह फैलाने के उद्गम स्थान माने जाते हैं। कहना न होगा कि अफवाहों के कारण सैंकड़ों पुरुष आतंकित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ता में कुछ का कुछ अनर्थ कर बैठते हैं, कई तो भयवशात् 'हृदय गति' बन्द हो जाने के कारण मृत्यु के मुख में चले जाते हैं, बहुत से बैंकों का दिवाला निकल जाता है। इसीलिए लड़ाई झगड़े के दिनों में सरकार को ऐसे जंगी जीवों की रोक थाम के लिए आर्डीनेंस तक बनाने पड़ते हैं। सचमुच इस प्रकृति के मनुष्य न केवल अपने लिये बल्कि अपने पड़ोसियों, नगरवासियों एवं देश तक के लिए भयावह सिद्ध होते हैं। ऐसे सज्जनों (?) को कहा जाता है कि इनका पेट बहुत छोटा है, अर्थात् इनको साधारण सी बात भी नहीं पचती।
दूसरे वे लोग हैं जो बड़ी से बड़ी रहस्यपूर्ण भयंकर बात सुन कर भी उसे ऐसा पी जाते हैं कि आयु भर दूसरे के सामने उसकी गन्ध तक नहीं आने देते। महाभारत में प्रसिद्ध है कि दानवीर कर्ण कुन्ती की प्रथम सन्तान थे अर्थात् महाराजा युधिष्ठिर के ज्येष्ठ भ्राता थे, परन्तु कुन्ती ने यह रहस्य कर्ण के जीवन काल में किसी पर प्रकट नहीं किया, उसके मरने पर ही युधिष्ठिरादि को बताया कि 'अपने ज्येष्ठ भ्राता कर्ण को जलाञ्जलि प्रदान करो'—इस पर युधिष्ठिरादि को बहुत शोक हुआ, कदाचित् यह रहस्य पहले विदित हुआ होता तो महाभारत का संहारक संग्राम ही न ठना होता—अतः स्त्री जाति को शाप दिया कि 'इनको बात न पचा करे'—इस कथा का तात्पर्य जो भी हो परन्तु प्रत्यक्षतः स्त्री जाति अपने छोटे पेट के लिए बहुत काफी प्रसिद्ध है, इसलिए धर्मशास्त्रों तक में उनकी इस प्रकृति से अनर्थ हो जाने की आशंका के विचार से ही 'स्त्रीषु नर्म्मविवाहे च नानृतं स्यात् जुगुप्सितम्' अर्थात्—स्त्रियों में उपहास में और विवाहादि—विनोद के अवसरों पर अयथार्थ कह देना पाप नहीं माना है, अस्तु!
छोटे पेट से तात्पर्य्य है (जिसे बात न पचती हो) बड़े पेट का अर्थ है—बड़ी से बड़ी बात को भी शर्बत की तरह पी जाना, सो छोटा पेट रखने वाले लोग अपनी इस मूर्खतापूर्ण आदत के कारण सैंकड़ों विघ्नों के पात्र बन जाते हैं, परन्तु बड़ा पेट रखने वाले गम्भीर पुरुष बड़ी से बड़ी आपत्ति को भी धीरतापूर्वक पार कर जाते हैं, इसलिए तादृश शिक्षा ग्रहण करने के लिये चतुर कलाकार ने इस विज्ञानमय पवित्र चित्र में पेट को लम्बायमान अंकित किया है।