प्रत्येक गणेशचित्र के साथ हाथ में चँवर लिये बाँए दाएं दोनों ओर ऋद्धि और सिद्धि की समुपस्थिति प्रायः अंकित की जाती है, जिसका सीधा तात्पर्य यह है कि जो साधक सर्वविध विघ्न बाधाओं को पार करके तर्काश्रित बुद्धिवाद का समुपासक होगा, संसार भर की समस्त ऋद्धि और सिद्धि उसके चरण चूमने को सदैव उद्यत रहेगी।
इस प्रकार गणेश भगवान् के बाह्यचित्र की रूप रेखाओं के मनन करने से होने वाली शिक्षाओं का निरूपण करके हम घोरतम नास्तिकों से पूछना चाहते हैं कि—जब आप नित्य ही समाचारपत्रों में छपे रेखाचित्रों का बड़े चाव से अध्ययन करते हैं और सामयिक समस्याओं की वस्तुस्थिति प्रकट कर सकने योग्य व्यंग्यचित्र पर उसके निर्माता की कला की दाद देते हैं, तब हमारे जीवन की एक प्रबल समस्या पर सर्वांगपूर्ण प्रकाश डालने वाले गणेशचित्र और उसके प्रदर्शयिता भगवान् व्यासदेव की अनुपम प्रतिभा पर नतमस्तक क्यों नहीं होते? हम समझते हैं कि हमारी इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद घोरतम नास्तिक भी प्रत्येक कार्य के आरम्भ में उपर्युक्त चित्र का मनन करके अपने आपको तादृश बनाने में कृतकार्य हो सकेगा, जैसा बन जाने पर कि वास्तव में किसी कार्य में भी विघ्न बाधा उपस्थित होने की सम्भावना शेष नहीं रह सकती।