पौराणिक स्वरूप—
पुराण ग्रन्थों में गणेश की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई कथाएँ उपलब्ध होती हैं, यद्यपि कल्प भेद के कारण तत्तत् कथानकों में किञ्चित् भेद भी पाया जाता है, परन्तु मूल बातें सभी कथाओं में समान ही पाई जाती हैं। यथा—
(१) गणेश—किसी कर्म-फल जन्य शरीर धारी माता पिता द्वारा गर्भ से उत्पन्न नहीं हुए, किन्तु अमैथुनी सृष्टि के अनादि और स्वयम्भू देवता हैं।
(२) उनका मस्तक छिन्न होने पर ही गज-मस्तक जोड़ा गया है।
(३) वे सभी देवताओं में एकस्वर से प्रथमपूज्य नियत किए गए हैं।
(४) वे गजमुख, एकदन्त, चतुर्भुज और लम्बोदर हैं। इत्यादि
पौराणिक स्वरूप
(क) कदाचिन्मज्जमानायां पार्वत्यां वै सदाशिवः।
नन्दिनं परिभर्त्स्यैवमाजगाम स्वयं तदा॥
उत्तस्थौ मज्जमाना सा लज्जिता सुंदरी तथा।
एवं जाते तदा काले कदाचित्पार्वती शुभा॥
मदीयसेवकः कश्चिद् भवेच्छुभतरस्तदा।
इत्थं विचार्य्य सा देवी करयोर्जलसम्भवम्॥
शंखमुत्सार्य्य तेनैव निर्ममे पुत्रकं शुभम्॥
(शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ३२)
(ख) कदाचिद् गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा।
चूर्णैरुद्वर्तयामास मलेनापूरितं वपुः॥
तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्।
पुरुषं क्रीडती देवी साक्षेपं च तदम्भसि॥
(पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय ४५४-५५)
(ग) यच्चापि हसितं तेन देवेन परमेष्ठिना।
मूर्तिमानपि तेजस्वी हसतः परमेष्ठिनः॥
प्रदीप्तास्यो महादीप्तः कुमारस्त्रासयन् दिशः॥
तं दृष्ट्वा परमं रूपं कुमारस्य महात्मनः।
उमा निमेषनेत्राभ्यां सहापश्यत् सुभामिनी।
तं दृष्ट्वा कुपितो देवः स्त्रीभावं चञ्चलं तथा॥
मत्वा कुमाररूपं तं शोभनं मोहनं दृशाम्॥
ततः शशाप तं देवो गणेशं परमेश्वरः।
कुमार! गजवक्त्रस्त्वं प्रलम्बजठरस्तथा॥
(वाराह पुराण २३। १४—१८)
(घ) प्रतिष्ठाप्य तदा द्वारि निवार्य्यो य इहागमेत्।१९।
एतदन्तरमासाद्य शूलपाणिस्तथोत्तरे।
आगत्य च त्रिशूलेन शिरस्तस्य न्यपातयत्॥६९॥
इत्येवमभिमन्त्रेण मन्त्रितश्च यदा पुनः।
तदोत्तस्थौ पुनश्चायं शुभाङ्गः सुन्दरस्तथा॥३९॥
अभिषिक्तस्तदा देवगणाध्यक्षैर्गजाननः॥४०॥
(शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ३२-३३)
(ङ) नायकेन विना देवि! मया भूतोऽपि पुत्रकः॥७२॥
यस्माज्जातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः॥७३॥
(शिवपुराण ज्ञानसंहिता अध्याय ३३)
(च) शङ्कराय ददौ तां च पार्वतीं पर्वतो मुदा॥१४॥
स रेमे नर्मदातीरे पुष्पोद्याने तया सह॥१५॥
सहस्रवर्षपर्य्यन्तं देवमानेन नारद॥१६॥
(ब्रह्मवैवर्त गणपतिखण्ड अध्याय १)
दृष्ट्वा सुरान् भयार्तांश्च… स विष्णुर्विष्णुमायया।१९
गणेशरूपः श्रीकृष्णो बालरूपं विधाय सः।८२-८३।
तल्पस्थे शिववीर्य्ये च मिश्रितः स बभूव ह॥८४॥
(ब्र० वै० गण० ८)
(छ) एतस्मिन्नन्तरे तत्र द्रष्टुं शङ्करनन्दनम्।
आजगाम महायोगी सूर्य्यपुत्रः शनैश्चरः॥
(ब्र० वै० गण० ११।५)
शनेश्च दृष्टिमात्रेण चिच्छेद मस्तकं मुने!।७।
विस्मितास्ते सुराः सर्वे… आरुह्य गरुडं हरिः।१०-११
गजेन्द्रं निद्रितं तत्र… तथोदक् शिरसं रम्यम्।१२-१३
रुचिरं तत् शिरः सम्यग् योजयामास बालके।२१।
जीवयामास तं शीघ्रं हुंकारोच्चारणेन च।२२।
सर्वाग्रे तव पूजा च मया दत्ता सुरोत्तम।
(ब्रह्मवैवर्त गण० १३)
(ज) पितुरव्यर्थमस्त्रं च दृष्ट्वा गणपतिः स्वयम्।
जग्राह वामदन्तेन नास्त्रं व्यर्थं चकार ह।३६।
निपात्य पर्शुवेगेन छित्वा दन्तं समूलकम्।
जगाम रामहस्तञ्च महादेवबलेन च।३४।
(ब्रह्मवैवर्त गण० ४३)
विष्णुरुवाच—
पुत्राभिधानं वेदेषु पश्य वत्से! वरानने!
'एकदन्त' इतिख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्॥
(ब्र० वै० गण० ४४।८३)
अर्थात्—(क) किसी समय पार्वती स्नान कर रही थी, (रोकने पर) द्वारपालभूत नन्दीगण को झिड़ककर सदाशिव भगवान् स्वयं अन्दर आ पहुँचे। तब स्नान करती हुई सुंदरी पार्वती लज्जित होकर उठ खड़ी हुई। ऐसा होने पर पार्वती ने सोचा कि कदाचित् मेरा कोई निजी सेवक हो तो ठीक रहे। ऐसा विचार करती हुई पार्वती ने अपने हाथों से कमल निर्मित चूड़ियें उतार उनसे ही एक पुतला बनाया।
(ख) शैल-पुत्री ने कभी अपने शरीर पर सुगन्धित तैल की मालिश की और उबटन के साथ उस चिकनाहट को उतारते हुए सब शरीर मैल से परिपूरित हो गया। अनन्तर उस मैल को लेकर हाथी जैसे मुखवाला एक पुतला बनाकर एक बार जल में डालती हुई क्रीड़ा करने लगी।
(ग) भूतभावन भगवान् शिव अद्भुतरूप-सम्पन्न गणेश को देखकर हँसने लगे। तब वह तेजस्वी कुमार सब दिशाओं को प्रदीप्त करता हुआ और भी अधिकाधिक शोभायमान होने लगा, पार्वती उस परमसुन्दर कुमार के रूप लावण्य को निर्निमेष नेत्रों से उत्कंठापूर्वक देखने लगी। शंकर पार्वती की इस स्त्री-सुलभ चंचलता को देखकर और बालक की मनोमोहक सुन्दरता को देखकर क्रुद्ध हुए और गणेश को शाप दिया कि—हे कुमार! तुम्हारा मुख हाथी के समान हो! और तुम्हारा पेट भी लम्बा हो जाए!
(घ) पार्वती ने इस (मलनिर्मित पुतले को) द्वार पर खड़ा किया और कहा कि जो अन्दर आए उसे रोको। अनन्तर शूल हाथ में लिए शिव आ पहुँचे। (रोकने पर) शिव ने त्रिशूल से मस्तक काटकर गिरा दिया। (पुनः पार्वती को प्रसन्न करने के लिए) ज्यों ही मन्त्रजल से उसे अभिमन्त्रित किया, वह पूर्ववत् सुन्दर सजीव हो गया। तब सब देवताओं ने उसको समस्त गणों के अधिष्ठाता पद पर अभिषिक्त किया।
(ङ) महादेव ने कहा—हे पार्वती! यह कुमार मुझ नायक के बिना ही उत्पन्न होकर पुत्र बना है, इसलिए इसका अन्वर्थ नाम 'वि-नायक' प्रसिद्ध होगा।
(च) हिमाचल ने अपनी पुत्री पार्वती, शंकर भगवान् को प्रदान की। नर्मदा के किनारे पुष्पोद्यान में शंकर पार्वती से रमण करने लगे। देवताओं के एक सहस्र वर्ष बीत गए। (असुरों के) भय से त्रस्त हुए देवताओं को देखकर विष्णु भगवान् अपनी वैष्णवी माया से शय्या पर गिरे। शिव वीर्य्य में मिश्रित होकर बालरूप श्रीकृष्ण भगवान् गणेशरूप में परिणत हो गये।
(छ) इसी समय महायोगी सूर्य्य-पुत्र शनैश्चर शंकर भगवान् के इस पुत्र को देखने के लिए यहां आ पहुँचे। शनि की दृष्टिमात्र पड़ने से बालक का मस्तक छिन्न हो गया, तब सब देवता बहुत चकित हुए। (रंग में भंग देखकर) विष्णु भगवान् गरुड़ पर चढ़ कर चले, मार्ग में उत्तर को शिर किये सोते हुए हुए एक हाथी को देखकर सुदर्शन चक्र के साथ उसका मस्तक काट कर ले आए और उस सुन्दर मस्तक को बालक के अंग पर संयुक्त कर दिया, तथा सब देवताओं से पूर्व तुम्हारी पूजा होगी ऐसी व्यवस्था की।
(ज) (सहस्रार्जुन और परशुराम के युद्ध प्रसंग के समय) गणेश जी ने देखा कि—(परशुराम ने) मेरे पिता को प्रदान किया हुआ अमोघ अस्त्र सन्धान किया है, तब जानबूझ कर उसे सफल बनाने के निमित्त अपने बाएं दांत पर ओटा, पर्शु ने प्रहार वेग से दांत को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया और पुनः वह महादेव के बल से परशुराम के ही हाथ में चला गया। (चिंतित पार्वती को) विष्णु भगवान् ने कहा—हे देवि! वेदों में अपने पुत्र का नाम देखो वहां 'एकदन्त' लिखा है, वे सब देवताओं से इसी नाम से पूजित हैं।