सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परम तत्त्व ही गणपतितत्त्व है, क्योंकि 'गणानां पतिः गणपतिः', गण शब्द समूह का वाचक होता है। 'गणशब्दः समूहस्य वाचकः परिकीर्तितः।' समूहों के पालन करने वाले परमात्मा को गणपति कहते हैं। देवादियों के पति को भी गणपति कहते हैं। अथवा—'महत्तत्त्वादि-तत्त्वगणानां पतिः गणपतिः' अथवा—'निर्गुणसगुणब्रह्मगणानां पतिः गणपतिः', तथा च—सर्वविध गणों को सत्ता स्फूर्ति देने वाला जो परमात्मा है वही गणपति है। अभिप्राय यह कि 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' इस न्याय से जिसमें ब्रह्मतत्त्व के जगदुत्पत्तिस्थितिलयलोलत्व, जगन्नियन्तृत्व सर्वपालकत्वादि गुण पाए जाएँ वही ब्रह्म होता है। जैसे आकाश का जगदुत्पत्तिस्थितिकारणत्व—"आकाशादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते" इस श्रुति से जाना जाता है। इसलिए वह भी आकाश पदवाच्य परमात्मा माना जाता है।

अतीन्द्रिय सूक्ष्मातिसूक्ष्म निर्णय केवल शास्त्र के ही आधार पर किया जा सकता है। जैसे शब्द की अवगति श्रोत्र से ही होती है वैसे ही पूर्ण परम तत्त्व की अवगति शास्त्र से ही होती है। इसीलिए "तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि, शास्त्रयोनित्वात्" इत्यादि श्रुतिसूत्र तथा अनेकविध युक्तियों से भी यही साबित होता है कि सर्व जगत् कारण ब्रह्म शास्त्रैकसमधिगम्य है। यदि शास्त्रातिरिक्त अन्य प्रमाणों से वस्तुतत्त्व की अवगति हो जाय शास्त्र को अनुवादक मात्र होने से नैरर्थक्य-प्रसंग दुर्वार होगा; इसीलिए गणपति तत्त्व की अवगति में मुख्यतया शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्रानुसार यही जाना जाता है कि 'गण्यन्ते बुद्ध्यन्ते ते गणाः' इस व्युत्पत्ति से सर्वदृश्य मात्र गण है और उसका जो अधिष्ठान है वही गणपति है। कल्पित की स्थिति-प्रवृत्ति अधिष्ठान से ही होती है, अतः कल्पित का पति अधिष्ठान ही युक्त है। यद्यपि कहा जा सकता है कि तब तो भिन्न-भिन्न पुराणों में शिव विष्णु, शक्ति आदि ही ब्रह्मरूप से विवक्षित हैं। जब कि ब्रह्मतत्त्व एक ही है तो उसके नाना नाम रूप भिन्न-भिन्न पुराणों में कैसे पाये जाते हैं? पर इसका उत्तर यही है कि एक ही परमतत्त्व भिन्न-भिन्न उपासकों की भिन्न-भिन्न अभिलषित सिद्धि के लिए अपनी अचिन्त्य लीलाशक्ति से भिन्न २ गुणगण सम्पन्न होकर भिन्न-भिन्न नामरूपवान् होकर अभिव्यक्त होता है। जैसे वामनीत्व, सर्वकामत्व, सर्वरसत्व संकल्पादि गुण विशिष्ट ब्रह्मतत्त्व की उपासना करने से उपासकों को उपास्यविशेषणभूत गुण ही फल रूप में प्राप्त होते हैं; ठीक वैसे ही प्राधान्येन विघ्नविनाशकत्वादि गुणगणविशिष्ट गणपति रूप में वही परमतत्त्व आविर्भूत होते हैं।

यदि कहा जाए कि फिर इसी तरह से बाह्याभिमत भिन्न-भिन्न देव भी ब्रह्मतत्त्व ही होंगे; तथा इतना ही क्यों, जब कि सारा ही प्रपञ्च ब्रह्मतत्त्व है तब गणपति ही क्यों विशेष रूप से ब्रह्म कहे जाएँ। इसका उत्तर यही है कि ठीक, यद्यपि अधिष्ठान रूप से बाह्याभिमत देव तथा तत्तद्वस्तु सकल ब्रह्मरूप कही जा सकती है, तथापि तत्तद्गुणगण विशिष्ट रूप से ब्रह्मतत्त्व तो केवल शास्त्र में ही जाना जा सकता है, अर्थात्—शास्त्र ही जिन २ नामरूप-गुणयुक्त तत्त्वों को ब्रह्म बतलाते हैं वही ब्रह्म हो सकते हैं। क्योंकि यह कहा जा चुका है कि अतीन्द्रिय वस्तु का ज्ञान कराने में एकमात्र शास्त्र ही प्रमाण हो सकते हैं। शास्त्र मुख्य रूप से वेद और वेदानुसारी स्मृतीतिहासपुराणादि ही हैं, यह बात आगे पूर्ण रूप से विवेचित की जायगी। शास्त्र गणपति को पूर्ण परब्रह्म बतलाते हैं।