ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है कि—पार्वती के तप से गोलोकनिवासी पूर्ण परब्रह्म श्रीकृष्ण परमात्मा ही गणपतिरूप से प्रादुर्भूत हुए हैं। गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं। इसी गणपति तत्त्व को सूचित करने वाला ऋग्वेद (अष्टक २ अध्याय ६ वर्ग २९) का यह मन्त्र है—
"गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्।"
इससे मिलता-जुलता ही यजुर्वेद में भी गणपतिस्तावक मन्त्र है। "गणानान्त्वा गणपतिं…" इत्यादि ऋग्वेद का जो मन्त्र है उसका सर्वथा ही गणपति-स्तुति में तात्पर्य है। एवं यजुर्वेदगत मन्त्र का विनियोग यद्यपि अश्वस्तवन में है, तथापि केवल अश्व में मन्त्रोक्तगुण अनुपपन्न होने से अश्वमुखेन गणपतितत्त्व की ही स्तुति इस मन्त्र से होती है। मन्त्रार्थ यों है—
(हे वसो!) वसति सर्वेषु भूतेषु व्यापकत्वादिति तत्सम्बुद्धौ (गणानां) महदादीनां ब्रह्मादीनामन्येषां वा (गणपतिं) गणरूपेण साक्षिरूपेण, ज्ञेयाधिष्ठानरूपेण वा 'गण सङ्ख्याने' इत्यस्माद् गण्यते बुध्यते योगिभिः साक्षात्क्रियते यः स गणस्तद्रूपेण वा पालकः, एतादृशं (त्वा आह्वयामहे) तथा (प्रियाणाम्) वल्लभानां (प्रियपतिं) प्रियस्य पालकं तच्छेषतयैव सर्वस्य प्रेमास्पदत्वात्, 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति श्रुतेः। (निधीनां) सुखनिधीनां सुखनिधे मदन्तःकरणे प्रादुर्भूय स्वस्वरूपानन्दसमर्पणेन (ममापि) पतिर्भूयाः। पुनः हे देव! (अहन्ते गर्भधम्) अजायां प्रकृतौ चैतन्य-प्रतिबिम्बात्मकं चैतन्यम्, (तथा च—मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहमिति भगवत्स्मरणात्।) (आकृष्य) योगबलेन, (अजानि) स्वहृदि स्थापयानि, (त्वं च मम हृदि) (अजासि) क्षिपसि स्वस्वरूपं स्थापयसि।
भावार्थ—अधिकारी उपासक गणपति की प्रार्थना करता है—हे सर्वान्तर्यामिन्! देवादि समूहों का अधिष्ठान तथा साक्षीरूप से पालन करने वाले, प्रियों को प्रियरूप से पालन करने वाले, लौकिक प्रेमास्पदों को परम प्रेमास्पदरूप से स्वसम्बन्ध द्वारा पालन करने वाले, लौकिक सुखराशियों को अलौकिक परमानन्दरूप से पालन करने वाले, अर्थात् अपने अंश से सम्पादन करने वाले आपको मैं पतिरूप से आह्वान करता हूँ। आप मुझे भी स्वस्वरूपानन्द समर्पण द्वारा पालन करें। जगदुत्पादनार्थ प्रकृतिरूप योनि में स्वकीय चैतन्य प्रतिबिम्बात्मकरूप गर्भ को धारण करने वाले बिम्बचैतन्यरूप को मैं अपने हृदय में विशुद्धान्तःकरण से धारण करूँ। एतदनुकूल आप अनुग्रह करें, ऐसी प्रार्थना है।