गणेश परमात्मा का विघ्न-नाशक स्वरूप है, इसीलिए प्रत्येक कार्य के आरम्भ में सर्वप्रथम गणेश जी के पूजन व ध्यान का शास्त्रीय आदेश है, विघ्न—दैवी और लौकिक—दो प्रकार के होते हैं, दैवी विघ्नों की निवृत्ति के लिए ईश्वर प्रार्थना और लौकिक विघ्नों को दूर करने के लिए कार्य्यकर्ता का सर्वतोभावेन 'युक्तचेष्ट' होना आवश्यक है। गणेश उपासना से ये दोनों प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। दैवी विघ्नों का मूल पूर्वकृत तत्तत् कर्मों का विपाक है, परन्तु लौकिक विघ्नों का मूल कारण हमारी मूर्खता, अनवधानता एवं अयुक्त चेष्टा है। प्रायः देखा जाता है कि जो लोग अभिमान, मात्सर्य, क्रोध, लोभ तथा प्रलाप आदि दुर्गुणों वाले होते हैं वह प्रत्येक कार्य में अपने अनेक शत्रु बना लेते हैं, शत्रुओं का बाहुल्य ही विघ्नों का मूल है। सो हमारे कार्य्य में कोई विघ्न न पड़े एतदर्थ जहां गणेश की गजवदन, लम्बोदर, एकदन्त-मूर्ति का ध्यान करते हुए पूर्व लेखानुसार साधक अनेक शिक्षाएँ प्राप्त करता है, वहां अपने मुख से गणेश के द्वादश नामों का उच्चारण करता हुआ भी उनके अर्थों का मनन करके अनेक शिक्षाओं से लाभान्वित होता है; वे द्वादश नाम प्रत्येक सनातनधर्मी गणेशपूजा के समय इस प्रकार बोलता है—

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥
(पूजा पद्धति)

अर्थात्—(१) सुमुख, (२) एकदन्त, (३) कपिल, (४) गजकर्ण, (५) लम्बोदर, (६) विकट, (७) विघ्ननाशक, (८) विनायक, (९) धूम्रकेतु, (१०) गणाध्यक्ष, (११) भालचन्द्र, (१२) गजानन। इन बारह नामों को जो पढ़ता है या सुनता है, विद्यारम्भ, विवाह, नगर प्रवेश, यात्रा-प्रस्थान, युद्ध और संकट के समय में उसके किसी कार्य में विघ्न नहीं पड़ता।