वास्तव में गणेशतत्त्व मन का ही उपलक्षण है। चेतन पुरुष और जड़-प्रकृति को ही शास्त्रों में 'शिव पार्वती' नाम से स्मरण किया गया है। पुरुष एक और अद्वितीय है, परन्तु प्रकृति के परा और अपरा दो भेद माने गये हैं, सो एक शंकर का प्रथम दक्ष-कन्या सती से पुनः हिमालय कन्या पार्वती से सम्बन्ध प्रकट किया गया है। सती रूप परा प्रकृति का सृष्टि से कोई सम्बन्ध नहीं अतः पुराणादि ग्रन्थों में सती की सन्तान का वर्णन नहीं मिलता, अपरा प्रकृति ही संसार की हेतु है इसलिए उससे ही षण्मुख, गजमुख आदि विलक्षण सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है। पत्थर जड़ता का उपलक्षण है तत्सम्भव पार्वती नाम भी इसी आशय से प्रयुक्त होता है, सो प्रत्येक प्राणी का चेतन जीव पुरुषतत्त्व का अंश है और जड़देह प्रकृतिदेवी का विकाश। उक्त जड़ और चेतन दोनों के योगायोग से एक तीसरा तत्त्व उत्पन्न होना स्वाभाविक है क्योंकि जब असमान गुण वाली दो वस्तुओं का सम्मेलन होता है तो उसका परिणाम अनिवार्यरूप से अन्य तीसरे पदार्थ का प्रादुर्भाव होता है, सो प्रकृति पुरुष के संयोग का परिणाम ही वह तीसरा तत्त्व मन है, प्रकृति जड़ है, पुरुष चेतन है, और तत्सम्भव मन—'उभयात्मकं मनः' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार जड़ चेतन दोनों की ग्रन्थि कहा जाता है, यही दार्शनिक भाव शिव-पार्वती के संयोग से गणेश की उत्पत्ति के रूप में प्रकट किया गया है। जड़-प्रकृति के पूर्ण विकाश का अन्तिम परिणाम-सर्वातिशायी शरीर-गुरुत्व हाथी में दीख पड़ता है और बुद्धिजीवी प्राणी के रूप में चेतनांश का अन्तिम विपरिणाम मनुष्य में व्यक्त हुआ है, इसलिए—'उभयं वा एतत्प्रजापति निरुक्तश्चानिरुक्तश्च' के अनुसार वही द्वैततत्त्व मन रूप गणेश में गज और नर के सामञ्जस्य से व्यक्त किया जाता है।

कहना न होगा कि समस्त कार्य-कलाप की साधना एकमात्र मनस्तत्त्व पर निर्भर है—'मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः' 'तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु' और 'मन जीते जग जीत' आदि सूक्तियें हमारे इसी आशय को पुष्ट करती हैं। सर्व प्रथम प्रत्येक कार्य का संकल्प मन में बनता है, फिर वही वाणी और कर्म में परिणत होता है इसीलिए वेद कहता है कि—

'यन्मनसानुमनुते तद् वाचा वदति, यद् वाचा वदति तत् कर्म्मणा करोति।'

अर्थात्—जो मन से मनन करता है सो ही वाणी से बोलता है, जो वाणी से बोलता है सो ही कर्म करता है।

इसलिये प्रत्येक कार्य की सिद्धि प्रबल मनोयोग पर अवलम्बित है। इसे ही लोकभाषा में 'लगन' कहते हैं। आधुनिक मिस्मरेज्म आदि प्रणाली के अभ्यासी लोग इसको ही 'विल पावर' कहकर पुकारते हैं। सो प्रत्येक कार्य के आरम्भ में साधक को किस प्रकार आत्म विश्वास उत्पन्न करना चाहिए यह तथ्य गणेश के उपर्युक्त बारह नामों में निहित है, यथा—

सुमुख—मन=समस्त इन्द्रियगण का मुख=मुख्य=मुखिया है।

एकदन्त—मन 'युगपद्ज्ञानानुत्पत्ति मनसो लिंगम्' इस दार्शनिक सिद्धान्त के अनुसार एक समय एक ही वस्तु में लगाया जा सकता है।

कपिल—मन अपनी चंचलता में कपि—वानर को भी मात देने वाला है।

गजकर्ण—मन दूसरे के मन की गुप्त बात को भी आकार, इंगित, चेष्टा, भाषण और गति आदि में तत्काल भांप लेता है।

लम्बोदर—समस्त संसार की दृष्टश्रुत लम्बी-चौड़ी घटनाएँ इनके एक कोने में समा जाती हैं।

विकट—यह इतना विकट है कि अर्जुन जैसे सव्यसाची योधा ने भी इसके प्राबल्य के सामने नतमस्तक होकर श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में—'चञ्चलं हि मनः कृष्ण! प्रमाथि बलवद्दृढम्' कहते हुए हथियार डाल दिए हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन की इस क्रिया का प्रतिवाद न कर स्वयं भी—'असंशयं महाबाहो! मनो दुर्निग्रहं चलम्' कहते हुए इसका समर्थन ही किया है, तभी तो संसार में चलते पुर्जे पुरुष को कहा जाता है कि इसका तो विकटों-पर्यन्त पाठ पहुँचा हुआ है।

विघ्ननाश—जब प्रबल मनोयोग से कोई कार्य किया जायगा तो विघ्न बाधाएँ अपने आप काफूर हो जायेंगी।

विनायक—यही सब इन्द्रियों का विशिष्ट स्वामी है, जहां यह संयत हुआ कि इन्द्रियों में कोई विकार हो ही नहीं सकता।

धूम्रकेतु—संकल्प विकल्पात्मक अविस्पष्ट धूम धूसर कल्पनाओं की सत्ता ही मन के अस्तित्व का प्रबल प्रमाण है।

गणाध्यक्ष—संख्या में आ सकने योग्य सभी सांसारिक पदार्थों का यह स्वामी है।

भालचन्द्र—शंकर भगवान् के मस्तक में विराजमान चन्द्रमा का ही यह संक्षिप्त संस्करण है। क्योंकि विराट् के मन से चन्द्रमा उत्पन्न हुआ है और उस चन्द्रतत्त्व से सब प्राणियों के मन अनुप्राणित हैं।

गजानन—हाथी की भांति इसका मुख भाग ही विलक्षण है, यदि साधक धैर्यपूर्वक आरम्भिक कठिनाइयों को पार कर जाए तो फिर कण्ठ से नीचे का उत्तर भाग तो चेतनांश का ही विपरिणाम है। अर्थात्—आरम्भ में ही साधक को मनः का अटपटापन खलता है पश्चात् वही मन साधना का इतना अभ्यासी हो जाता है कि उसके बिना अन्य किसी व्यापार में वह शान्ति अनुभव नहीं करता।

यह स्पष्ट है कि यदि साधक उक्त द्वादश नामों का अर्थ मननपूर्वक उच्चारण करे तो उनमें आत्म-निर्भर होने की भावना जागृत हो सकती है।