गणपति अथर्वशीर्ष में लिखा है कि—
ॐ नमस्ते गणपतये
ॐकाररूप गणपति के लिए नमस्कार।
हम पीछे मौद्गल पुराण के प्रमाण से यह सिद्ध कर आए हैं कि वास्तव में विश्वतोमुख सगुण ॐकार ही गणेशरूप में पूजा जाता है, सो यदि विश्वतोमुख ॐकार की लेख्य प्रतिमा बनाए तो वह इस प्रकार बनेगी—
इसे किसी ओर से देखो, ॐकार ही दीख पड़ेगा, परन्तु इसका निर्माण विचक्षण चित्र-कलाकार ही कर सकता है, अतः सर्व साधारण में इसका सरल रूप आज भी सर्वत्र इस प्रकार लिखकर पूजा जाता है जिसे स्वस्तिक कहा जाता है। भारतीय संस्कृति के इस पवित्र चिह्न को अन्य सभ्य देशों ने भी अपनी संस्कृति में परिगृहीत किया है, परन्तु जिस प्रकार गंगा से निकलने वाला गङ्गा-प्रवाह ज्यों २ आगे बढ़ा है त्यों २ अनेक सहायक नदियों के संगम से विचित्र होता गया है, ठीक इसी प्रकार हमारी संस्कृति और उसके चिह्न भी अन्यान्य देशों में कुछ विचित्र अवश्य हो गये हैं, सो जर्मनी आदि देशों में स्वस्तिक और भी लघुकाय हो गया है, जैसा कि प्रस्तुत चित्र से जाना जा सकता है। नाजी लोगों ने जो कि अपने को विशुद्ध आर्य्य मानने में गौरव अनुभव करते हैं, इसी रूप को महत्व दिया है। परन्तु इंगलैंड आदि अन्यान्य सभी ईसाई जातियें इसे और अधिक सरल बनाकर 'क्रास' कहकर सम्मान देती हैं, इसका कुछ विवेचन पीछे लिख आए हैं। इस्लामी संस्कृति सम्पन्न जातियें इसे अर्धचन्द्र सहित सर्वतोमुख तारे के रूप में सम्मान देती हैं। वह वास्तव में ओंकार का अर्धबिन्दु चिह्न ही है।