सनातनधर्म्मी प्रत्येक शुभाशुभ कर्म के प्रारम्भ में नवग्रह पूजन अवश्य करता है, यह क्यों?

योगी याज्ञवल्क्य ने अपनी स्मृति में मन्त्र विनियोगपूर्वक ग्रह-शान्ति प्रकरण लिखा है, यथा—

श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत्।
(याज्ञ० स्मृति आचाराध्याय २९४)

अर्थात्—श्री और शान्ति की कामना करने वाले मनुष्य को ग्रहयज्ञ करना चाहिए।

हम पीछे 'अण्ड पिण्ड' सिद्धान्त में और 'मुहूर्त विज्ञान' प्रकरण में भी यह सिद्ध कर आए हैं, कि हमारा यह मानव पिंड तत्तद् देवताओं के दान से बनी एक पञ्चायती धर्मशाला के समान है। सो जैसे कोई संस्था धर्मशाला के निमित्त अपील करे तो सभी उदार दानी अपनी योग्यतानुसार दान देते हैं, एक ने भूमि दी तो दूसरे ने ईंट पत्थर, तीसरे ने लोहा लक्कड़, तो चौथे ने चूना सीमिण्ट—इस तरह उक्त दानियों के दान से थोड़े दिन में सर्वाङ्गपूर्ण धर्मशाला बनकर तैयार हो जाती है। संस्थाओं के संचालक दाताओं के सम्मानार्थ पत्थर में खुदा-खुदाकर उक्त दानियों के दान का विवरण तथा नाम धर्मशाला के मुख्य स्थान में लगवा देते हैं। जिस दिन उक्त धर्मशाला का उद्घाटन मुहूर्त होता है तो उक्त सभी दानियों को सादर बुलाया जाता है और भरी सभा में मन्त्रीजी अपनी रिपोर्ट उपस्थित करते हुए कृतज्ञता प्रकाशनार्थ उक्त दानियों का नाम ले-लेकर दान के उपलक्ष में उन सबका धन्यवाद करते हैं, यह लौकिक शिष्टाचार सर्वत्र प्रचलित है। यदि कदाचित् संस्था का मन्त्री दानियों का धन्यवाद न करे तो दानी जो कुछ दे चुके हैं—वह वापिस छीनने से तो रहे, परन्तु उक्त संस्था के संचालकों को कृतघ्न अवश्य समझा जायगा, क्योंकि दान मांगने के समय तो ये लोग टोली बनाकर द्वार-द्वार घूमते हुए प्रत्येक दानी को 'भवान् सोम भवान् सूर्य्यः' कहते थे, परन्तु अब अन्त में 'धन्यवाद' देते भी न बना। यह ठीक है कि धन्यवाद से पेट नहीं भरता परंतु हमने स्वयं बहुत से उत्सवों में यह काण्ड देखे हैं कि यदि मन्त्री जी अमुक व्यक्ति का धन्यवाद करना भूल गये तो महाराज! अमुक व्यक्ति अप्रसन्नता प्रकट करने के लिए तत्काल सभा स्थान छोड़कर नौ दो ग्यारह हो गए, पीछे मालूम पड़ने पर बड़ी-बड़ी क्षमा मांगने पर भी सीधे न हुए।

सो हमारे इस पिण्ड के निर्माण में भी सूर्यादि नवग्रहों का प्रधान हाथ रहा है। मानवपिण्ड में सूर्य ने आत्मा फूंकी, चांद ने मन दिया, मंगल ने रक्त का संचार किया बुध ने कल्पनाशक्ति दी, बृहस्पति ने ज्ञान प्रदान किया, शुक्र ने वीर्य और शनि महाराज ने सुख-दुःख की अनुभूति दी। इस प्रकार धर्मशाला-रूप हमारा यह शरीर इन्हीं महानुभावों की कृपा का फल है, सो उक्त धर्मशाला का जब-जब भी उत्सव होता है, अर्थात्—नींव डालने के समय=गर्भाधान से लेकर पुनर्निर्माण=अन्त्येष्टि संस्कार पर्यन्त जब-जब भी कभी अवसर आता है तब-तब उक्त सभी दाताओं के नाम लेकर—'सूर्याय नमः, चन्द्रमसे नमः, भौमाय नमः, बुधाय नमः, बृहस्पतये नमः, शुक्राय नमः और शनैश्चराय नमः, कहते हुए सबका धन्यवाद किया जाता है।

जो महाशय उक्त दाताओं से दान मांगते समय तो बड़ी-बड़ी चापलूसी से पेश आते हैं, परन्तु धन्यवाद करने के समय स्वयं भी मूक बन जाते हैं और उल्टा दूसरे लोगों को भी सन्मार्ग से परिभ्रष्ट करके अपने सदृश कृतघ्न=अहसान फरामोश बनाना चाहते हैं—वे निस्सन्देह ईश्वर के कोप भाजन बनते हैं।