यह बात सभी जानते हैं कि जो पुरुष जैसा प्रतिष्ठित होगा उसकी प्रतिष्ठा के अनुसार ही उसके यहां दुःख और सुख में दूसरे लोग सम्मिलित होते हैं, जैसे मौलाना साहिब के यहां बारात में मुहल्ले भर के मियां जुट सकते हैं क्योंकि आखिर अपने सगे भाई की लड़की से ही तो शादी=खाना आबादी करनी है। पादरी साहिब के यहां इससे कुछ अधिक की सम्भावना की जा सकती है, क्योंकि चाय के एक कप पर ही तो बारात की दौड़-धूप हो रही है। राजा साहिब के यहां राज्य भर के, और सम्राट् के यहां विदेशों तक के—मेहमान तशरीफ ला सकते हैं, क्योंकि इनका भाई-चारा इतना फैला हुआ है। बस! अहिन्दू लोगों के भाई-चारे की यही 'सा काष्ठा सा परा गतिः' है, परन्तु एक सनातनधर्मी हिन्दू का 'भाईचारा' इतना विस्तृत है कि उसके यहां न केवल देश-विदेशों के ही अपितु सूर्य-लोक, चन्द्र-लोक, सुदूर शनि-लोक और ब्रह्माण्ड कक्षा के परले किनारे—नक्षत्र प्रदेश तक के भी मेहमान पधारते हैं, जिनको वह अपने प्रत्येक शुभाशुभ कार्य में सम्मान देता है।

यहां यह आशंका व्यर्थ है कि इतने बड़े मेहमानों को बुलाकर उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप सम्मान नहीं किया जाता किन्तु जल के छींटे और चावल के दो दाने चढ़ाकर सूखा टरका दिया जाता है, निःसन्देह यह प्रश्न—'सामग्रीनेमनिवर्तक' किसी बड़ीछक पेटू का ही हो सकता है अन्यथा—प्रेम पन्थ का तो यह प्रधान 'मोटो' है कि—

'भाव बिन थूकूँ नहीं, गाड़ी भरे सामानपर।
रीझ जाता है मेरा मन, मान के एक पान पर॥