कहा जाता है कि अमुक वस्तु दान देने से ग्रह टल जाएगा। क्या ग्रह घूसखोर हैं और पोप जी ग्रहों के एजेण्ट हैं? जो इनको पाकेट भरने से सब काम ठीक बन जाएगा।

मालूम होता है कि महाशय जी को यह विदित नहीं है कि अचानक ही अमुक-अमुक रोग क्यों आ जाते हैं और मन भी परेशान क्यों हो जाता है? आयुर्वेद शास्त्र में लिखा है कि—

पूर्वजन्मकृतं पापं व्याधिरूपेण बाधते।
तच्छान्तिरौषधैर्दानैर्जपहोमसुरार्चनैः॥
(माधवनिदान)

अर्थात्—पूर्वजन्म-कृत पाप व्याधिरूप बनकर मनुष्य को कष्ट देते हैं और उनकी शान्ति औषधि, दान, जप, होम और देवपूजन से होती है। कहना न होगा कि यहां रोगों का कारण पूर्व जन्मार्जित पाप बताया है, यजुर्वेद स्वयं एकमात्र औषधि से उनकी शान्ति नहीं मानता किन्तु दान, जप, होम, देवपूजन को भी आवश्यक बताता है, यूनानी वाले भी दवा के साथ दुआ=ईश्वर प्रार्थना और खैरात आवश्यक समझते हैं। रुपया-पैसा कमाने में भी खून-पसीना एक करना पड़ता है, अतः द्रव्य को मनुष्य का 'बाह्य प्राण' माना है, सो यदि कोई पुरुष स्वेच्छा से दान रूप में अमुक-अमुक वस्तु प्रदान करेगा तो उसे मीठा मीठा किन्तु हर्षपूर्ण कष्ट अवश्य होगा, जिससे रोग कष्ट निवृत्त हो जाएगा, यानी रोगी को जितना कष्ट भुगतना था वह द्रव्य के देने से हो जायगा। इसीलिए दान, हैसियत से कम करने पर फल नहीं देता, इसलिए ग्रह घूसखोर नहीं किन्तु पूर्वजन्म के पापों का बदला चुकाने के लिए परमात्मा की ओर से नियुक्त न्यायाध्यक्ष हैं। जैसे जज इतना जुर्माना या इतने दिन की कैद की आज्ञा देते हैं, जुर्माना भरने पर कैद में जाने की आवश्यकता नहीं रहती, इसी प्रकार शारीरिक, मानसिक कष्ट या दान-पुण्यादिक इन दोनों विकल्पों से एक चुना जा सकता है, दान करने पर कष्ट अवश्य दूर होता है यह हमारा निजी अनुभव है। वेदपाठी ब्राह्मणों से अधिक भगवान् के एजेण्ट और कौन हो सकते हैं, यह स्वयं वेद कहता है। यथा—

यः आर्षेयेभ्यो याचद्भ्यो देवानां गां न दित्सति आ स देवेषु वृश्चते। (अथर्व० १२।४।१२)

अर्थात्—जो पुरुष देवताओं के निमित्त याचित गाय को वेदपाठी ब्राह्मणों को नहीं देता, देवता उसको दण्ड देते हैं।