पूछा जा सकता है, कि देवताओं की तृप्ति से मानवसमाज को क्या लाभ?—यहां यह समझ लेना चाहिए कि 'अण्ड पिण्ड वाद' सिद्धांत के अनुसार मानव पिण्ड देवगण की विभिन्न देनों का मूर्त परिणाम है, सो जैसे नल की टूटी को प्रधान जलाशय (वाटर वर्क्स) की, और विद्युत वलय (बिजली के बल्ब) को शक्ति केन्द्र (पावर हाउस) की सदैव अनिवार्य अपेक्षा रहती है ठीक इसी प्रकार अनुजीवी मानव पिण्ड को भी पदे २ अपने अनुजीव्य देवगण की अनिवार्य अपेक्षा रहती है। यद्यपि हम देवगण की अनुकम्पा के बिना अभिलषित भोगों को जुटाने की भी शक्ति नहीं रखते तथापि हम यह निर्मूल कल्पना भी कर लेते हैं, कि मान लो मनुष्य अपने उद्योग के बलबूते पर खानपान की सर्वविध सामग्री जुटाने में सफल हो सके परन्तु एतावता भी वह संगृहीत पदार्थों का स्वतन्त्रता पूर्वक उपभोग कर सकेगा यह उसके अपने सामर्थ्य की बात नहीं है, सैंकड़ों धनोमानी पुरुषों के यहां उपभोग सामग्री की कमी नहीं होती परन्तु अग्निमांद्य, अरुचि आदि रोगों के कारण वे कुछ भी खा पी नहीं सकते, पदार्थों को देख २ कर झींकते हैं। यह लोकोक्ति बहुत प्रसिद्ध है कि 'गरीबों को दूध प्राप्त नहीं होता और अमीरों को हज्म नहीं होता'। सो अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्तिरूप 'योग' और प्राप्त वस्तुओं का उपभोग कर सकने की क्षमता रूप 'क्षेम'—उभय विध सौकर्य केवल देवतात्मा भगवान् की ही देन हो सकती है इसलिये हवन द्वारा परितृप्त देवता मनुष्य को तत्तत् पदार्थों के उपभोग कर सकने की वह योग्यता प्रदान करते हैं, जो कि अन्य उपायों द्वारा कथमपि प्राप्त नहीं हो सकती।

देहाती भाषा में इस गूढ़ प्रकरण को सरल शब्दों में यूं कहा जा सकता है कि देवगण विविध प्रकार के दाता होने के कारण 'देवता' कहे जाते हैं और मनुष्य पदे २ उनसे लेनेवाला होने के हेतु 'लेवता' कहा जा सकता है तो लेवता का देवता बिना काम चल ही नहीं सकता।

दृष्टान्त प्रसिद्ध है कि एक राजा ने अपने पुरोहित से हवन के लाभ जानने की जिज्ञासा की। विद्वान् पुरोहित ने वेद शास्त्रानुसार यज्ञ-प्रक्रिया का वर्णन किया परन्तु परोक्षवाद पर निहित यज्ञ-तत्त्वों को प्रत्यक्षवादी राजा पूरी तरह न समझ पाया। ननु नच किन्तु व परन्तु करता ही रहा, अन्ततोगत्वा पुरोहितजी ने यज्ञ-प्रक्रिया समझाने की एक नवीन युक्ति निकाली। राजा से कहा तुम ब्रह्मभोज करो तब कुछ समझ में आएगा। वैसा ही किया गया, पुरोहितजी ने यज्ञ-प्रक्रिया के प्रगाढ़ ज्ञाता वेदपाठियों को एक भवन में बिठाया और दूसरे ब्राह्मणों को दूसरे भवन में। नानाविध पदार्थ परसे गए परन्तु भोजन से पूर्व पुरोहितजी के सङ्केतानुसार राजा ने समस्त ब्राह्मणों की कोहनी के साथ हाथ को एक २ डण्डा बांध दिया, और भोजन करने की आज्ञा दी। ब्राह्मणों ने ज्यों ही ग्रास उठाकर मुख में डालना चाहा तो वह मुड़ न सकने के कारण शिर से भी हाथभर ऊंचे गया। वे बड़े चकित हुए, राजा के भय के कारण कोई कुछ पूछ न सका और सामने पड़ा भोजन देखकर सांस भरते रह गए। परन्तु याज्ञिक ब्राह्मणों ने आपस में परामर्श करके दो पंक्ति लगा ली, सामने वाला व्यक्ति भोजन ग्रास उठाकर अपने सामने बैठे व्यक्ति के मुख में डालने लगा और दूसरा भी इसी भांति उसको खिलाने लगा। क्योंकि बंधा हुवा हाथ अपने मुख में नहीं पहुँच पाता था, सामने वाले के मुख में तो भलीभांति पहुँचता था। इस तरह सबने भरपेट भोजन किया और तृप्त होकर डकारें लेने लगे। राजा ने परितृप्त याज्ञिक ब्राह्मणों से जब इस सूझ का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि महाराज! श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् ने कहा है कि—

देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

अर्थात्—हे मनुष्यो! तुम यज्ञ प्रक्रिया से देवताओं को तृप्त करो, देवता तुम्हें तृप्त करेंगे, इस प्रकार एक दूसरे को तृप्त करते हुवे तुम दोनों का परम कल्याण होगा।

सो हमने यहां भी इसी यज्ञ सूत्र से काम लिया। कहना न होगा कि उपर्युक्त दृष्टान्त हवन विधान पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। निःसन्देह मनुष्य संसार में सब पदार्थों के होते हुवे भी कर्मबन्धन में बंधा हुवा उनका स्वतन्त्रता पूर्वक उपभोग कर सकने में स्वाधीन नहीं है। यदि मनुष्य यज्ञ यागादि द्वारा देवताओं को तृप्त करे तो फिर देवता भी उपभोग क्षमता प्रदान करते हैं। इसलिये अमुक २ संस्कार के समय विहित होमादि का, श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये।