वैदिक स्वरूप

(क) गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति गर्भं ते अश्विनोभा धत्तां पुष्करस्रजा।

(ख) गर्भं ते मित्रावरुणौ गर्भं देवो बृहस्पतिः। गर्भं त इन्द्रश्चाग्निश्च गर्भं धाता दधातु ते॥ (अथर्व ५, २५, ३ ४)

अर्थ—[क] (सिनीवालि!) हे अमावस्याधिष्ठातृदेवते, तथा (सरस्वति) हे वागधिष्ठातृदेवते, आप इस स्त्री को गर्भ धारण करने की सामर्थ्य दें एवं उसे पुष्ट करें। (पुष्करस्रजा) कमलों की माला से सुशोभित (उभा अश्विनौ) दोनों अश्विनीकुमार (ते) तेरे (गर्भं) गर्भ को (आधत्ता) पुष्ट करें। [ख] (मित्रावरुणौ) मित्र और वरुण (ते) तेरे (गर्भं) गर्भ को पुष्ट करें। (देवो बृहस्पति) देव गुरु बृहस्पति (गर्भं) गर्भ को पुष्ट करें। (इन्द्र) इन्द्रदेवता (अग्नि) सम्पूर्ण प्राणियों में—अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः—वैश्वानर रूप से व्याप्तदेव, (धाता) सृष्टि कारक ब्रह्मा, (ते) तेरे (गर्भ) गर्भ को (दधातु) पुष्ट करें।

उपर्युक्त वैदिक मन्त्रों के उद्धरण से यह ज्ञान हो गया होगा कि यह संस्कार वेदानुमोदित है। चूंकि मानव जाति के प्रतिनिधि भावी शिशु का सम्पूर्ण भविष्य इसी के ऊपर निर्भर है अतः इस संस्कार का महत्व निर्विवाद है। 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे'—इस श्रुति के अनुसार सन्तान माता पिता के आत्मा हृदय तथा शरीर से उत्पन्न होता है ऐसी दशा में माता पिता में होनेवाले शारीरिक या मानसिक गुण अवगुण भी सन्तान में अवश्य संक्रमित होंगे। उन दोषों को दूर करने के लिये गर्भाधान संस्कार की आवश्यकता होती है। इसीलिये मनुजी ने इस संस्कार का उद्देश्य—

निषेकाद्बैजिकं चैनो गार्भिकञ्चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानं फलं स्मृतम्॥

इस श्लोक में बीज तथा क्षेत्र दोनों की शुद्धि ही मुख्य रूपेण माना है।

प्रश्न हो सकता है कि—क्या चन्द मन्त्रों के उच्चारण तथा देवपूजनादि से शारीरिक और मानसिक दोषों की शान्ति संभव है? इसका उत्तर हम हां में ही देंगे। हमें यह न भूलना चाहिये कि मनुष्य के अच्छे या बुरे होने में उसके मन का प्रधान हाथ होता है। शास्त्रों में बतलाया गया है कि—

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

अर्थात्—मनुष्य का मन ही उसके सांसारिक कष्टपूर्ण बन्धन और नित्य सुखमय मोक्ष का कारण है। ऐसी दशा में जब दोषों के उद्गम और उनके दुर्भेद्य दुर्ग का हमें पता लग गया तो हमारा कर्तव्य यह हो जाता है कि हम सीधा आक्रमण उसी पर करें—उसके प्रवाह को बदलें और अभीतक उसकी जो शक्ति दोषों को उत्पन्न करने की ओर लगी हुई थी उसीको दोषों एवं दुर्गुणों के विनाश की ओर लगावें। इस तत्त्व को समझने वाले महर्षियों ने ही इस संस्कार का विधान किया है। मद मोह वासना से अन्धे हुए पुरुष के अन्धकार पूर्ण हृदय में ऐसे समय में भी अध्यात्मप्रदीप की एक लौ को प्रज्वलित रखना—भारतीय ऋषियों की ही विलक्षण बुद्धि का चमत्कार है। इस संस्कार के समय पढ़े जाने वाले—

(क) धातः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः।
पुमांसं पुत्रमाधेहि दशमे मासि सूतवे॥
(अथर्व ५।२५।१०)

(ख) यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्। वेदाऽहं तन्मां तद्विद्यात् पश्येम शरदः शतम् जीवेम शरदः शतँ शृणुयाम शरदः शतम्।
(पारस्कर० १।११।९ यजु० ३६।२४)

अर्थ—[क]—(धातः) हे सृजनाधिष्ठातृ देवता ब्रह्माजी! (श्रेष्ठेन रूपेण) श्रेष्ठ रूप के साथ (अस्या) इस (नार्या) स्त्री को (गवीन्यो) पार्श्वस्थ नाड़ियों में (पुमांसं पुत्र) पुरुष सन्तान को (दशमे मासि) दसवें महीने में (सूतवे) उत्पन्न होने के लिये (आधेहि) भली प्रकार स्थापित कीजिए। [ख]—(सुसीमे) हे सुन्दरि, (यत्ते हृदयम्) तुम्हारा जो हृदय (दिवि चन्द्रमसि श्रितम्) द्युलोकस्थ चन्द्रमा में स्थित है (तत् अहं वेद) उसे मैं जानता हूं और (तत् मां विद्यात्) वह मुझे जाने। अर्थात् हम दोनों एक दूसरे के मनोभावों को भली प्रकार समझें। हम दोनों सौ वर्ष तक देखें, जीवें, और श्रवण-शक्तियुक्त रहें।

—इत्यादि मन्त्र मनुष्य के मन को सात्विक भावों की तरफ आकृष्ट करते हैं। उसमें पशुत्व का उदय नहीं होने पाता। विषयोपभोग में प्रवृत्त हुआ भी वह उसे कामवासना की शान्ति का साधन नहीं समझता किन्तु सृष्टि यज्ञ जैसे पवित्र एवं वेद-निर्दिष्ट कर्तव्य की पूर्ति के लिये ही उसका सेवन करता है। उसके हृदय में अनुक्षण उठने वाली "मैं सत चित् आनन्दमय पूर्ण पुरुष का अंश हूं, यह मेरी प्रकृति है, देव ऋषि पितृ ऋण से मुक्त होने के लिये हम गर्भाधान करते हैं" आदि भावनाएं भावी मानव के शरीर निर्माण पर बड़ा प्रभाव डालती हैं।

यह सिद्ध हो चुका है कि गर्भाधान के समय पति पत्नी के हृदय में जिस प्रकार के विचार होते हैं—उनके हृदय और अन्तर्चक्षु के सन्मुख जो चित्र होता है—भावी शिशु उन्हीं सबके प्रतिबिम्ब को लेकर जन्म लेता है। अक्सर देखा गया है और समाचार पत्रों में प्रतिदिन ऐसे समाचार पाठकों को पढ़ने को मिलते हैं कि 'अमुक स्त्री ने एक ऐसे अद्भुत बालक को जन्म दिया जिसकी आकृति वानर की थी जिसके शरीर पर बाल थे और पूंछ थी' कभी 'दो सिर और चार हाथ वाले बालक का जन्म'। इन सब घटनाओं का मूल क्या है? कहना न होगा कि गर्भाधानकाल के ऊटपटांग विचारों ने ही ऐसी अद्भुत आकृतियों को जन्म दिया है। इसलिये गर्भाधान काल में मनुष्य के मन का प्रसन्न तथा धार्मिक भावयुक्त रहना नितान्त आवश्यक है।

हम पीछे कह आये हैं कि शिशु का निर्माण माता पिता के शरीर आत्मा और हृदय से होता है इन तीनों में भी मन की ही प्रधानता है वह बड़ा चंचल और अनियम्य है। वह प्रतिक्षण गतिमान् रहता है और बुद्धि को अपने साथ मिलाकर कुछ न कुछ मनन करता रहता है। यदि उसे कोई उचित सरणी न मिले तो उसके लिये विपथगामी होना कोई कठिन नहीं है। अन्य समय में मन की इस चंचलवृत्ति को सहन किया जा सकता है किन्तु गर्भाधान जैसे पवित्र और महत्त्वपूर्ण काल में, जब कि हम अपने वंश जाति और परम्पराओं के उत्तराधिकारी के निर्माण के लिये प्रस्तुत हो रहे हों, इस प्रकार की चंचल तथा सरणीहीन मनोवृत्ति,—अयोग्य, कुलकलङ्की तथा सर्वदा संताप एवं अनुताप की आग में जलानेवाले शिशु के जन्म का कारण बन सकती है। इसलिये मन को देवभाव युक्त करने तथा इस पवित्र एवं महान् कार्य की जिम्मेवारी अनुभव कराने के लिये ही क्रान्तदर्शी महर्षियों ने इस संस्कार का प्रचलन किया था।