जब सृष्टि में मनुष्य पशु पक्षी आदि सभी प्राणी, बिना शास्त्रोक्त गर्भाधान संस्कार के ही, गर्भाधान कर लेते हैं और उनके सन्तान भी हो जाती है, बल्कि पशु पक्षी तो दो चार पांच सात बच्चे तक एक बार उत्पन्न कर लेते हैं तब यह जिज्ञासा होनी स्वाभाविक है कि इसकी गणना संस्कारों में क्यों?

यह सत्य है कि पशु पक्षी बिना शास्त्रोक्त गर्भाधान के ही सन्तान उत्पन्न करने में सफल हो जाते हैं और मनुष्य भी हो रहे हैं किन्तु फिर भी मनुष्य और पशु में अक्ल का सोचने समझने की शक्ति का—जो महान् अन्तर है उसे भुलाना सहज नहीं है। ज्ञान शक्ति देकर प्रकृति ने पुरुषों पर जो अनुग्रह किया है वह पशुओं पर नहीं। पशु पक्षी सर्वात्मना प्रकृति माता के ही आश्रय पर जीवन निर्वाह करते हैं। प्रकृति ही उनकी सम्पूर्ण वृत्तियों की संचालिका होती है। वह उनको एक नियम के अन्दर चलाती और उससे रत्तीमात्र भी बाहर नहीं होने देती।

तात्त्विक दृष्टि से देखने पर तो हम कह सकेंगे कि आज के मनुष्य से पशु कई बातों में बढ़ा चढ़ा है और उसने मनुष्य के सामने एक आदर्श स्थापित किया है। गर्भाधान और समागम को ही लीजिये, पशु पक्षी एक निश्चित समय में ही—जो कि प्रकृति ने उनके लिये निश्चित कर दिया है—समागम करते हैं। उस समय भी वे अपनी घ्राण शक्ति द्वारा स्त्री के शरीर को सूंघकर यह ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं कि स्त्री गर्भिणी तो नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो फिर उससे समागम नहीं करते। इसके विपरीत पुरुष;—ज्ञानशक्ति सम्पन्न पुरुष! प्रकृति के सभी वैज्ञानिक बन्धनों को ताक पर रखकर समय कुसमय का कोई विचार न करता हुआ अपनी भोग लालसा को तृप्त करता है और इस प्रकार जान-बूझकर अपने अमूल्य स्वास्थ्य की हानि करके अकाल में ही मृत्यु के मुख में जा पहुँचता है। इसलिये प्रकृति प्रदत्त संयम—जो कि इस संस्कार के कतिपय प्रयोजनों में से एक है—के कारण पशु पक्षियों के लिये इस संस्कार की आवश्यकता भले ही न हो, किन्तु मनुष्य के लिये तो इसकी परमावश्यकता है।

इस संस्कार द्वारा स्त्री पुरुष के सम्बन्ध की पवित्रता तथा संयम के महत्त्व का दिग्दर्शन होता है। विवाहित स्त्री पुरुषों के सामने यह आदर्श विचार रखा जाता है कि तुम दोनों का सम्बन्ध विषय भोग की तृप्ति के लिये नहीं, किन्तु एक महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये है। केवल इसी पुत्रोत्पत्ति रूप उद्देश्य के लिये ही उन्हें समागम करना चाहिये। संयम पूर्वक गृहस्थ जीवन ही उनका आदर्श है व्यभिचार नहीं। विवाह का तात्पर्य यह नहीं, कि अब उनको विषय सेवन की खुली छुट्टी दे दी गई है, वे चाहे जैसे भी विषयभोग करते रहें वह पाप न होगा क्योंकि वे तो पति पत्नी हैं। कहना न होगा कि इस प्रकार विषय-सेवन व्यभिचार के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है।

प्रायः हम देखते हैं कि—माता पिता भाई बिरादरी—अर्थात् समाज की अनुमति से एवं वैदिक मन्त्रों की शक्ति से ही स्त्री पुरुष का पारस्परिक सम्बन्ध मान्य होता है। इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त यदि कोई स्त्री पुरुष आपस में ऐसा सम्बन्ध रखते हैं तो जहां लोक में उसे व्यभिचार गिना जाता है वहां परलोक में भी दुर्गति करनेवाला कहा जाता है।

परन्तु व्यभिचार की यह व्याख्या अधूरी है। इसके विषय में अनेक विचारशील व्यक्तियों का यह मत है कि 'व्यभिचार के लिये यह आवश्यक नहीं कि वह पराई स्त्री से ही हो, किन्तु अपनी विवाहिता स्त्री से भी शास्त्रीय नियमों के विरुद्ध समागम करना व्यभिचार ही है।' पाश्चात्य जगत् के सुप्रसिद्ध विद्वान् Dr. Balfowr (डा० बैलफोर) ने इस विषय का विवेचन करते हुए एक जगह लिखा है—

"विवाहित लोगों के मध्य में अत्यन्त विषय सेवन यथार्थ रूप से व्यभिचार है।" इसीलिये भगवान् कृष्ण ने गीता में 'धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ' कह कर धार्मिक भावना से युक्त काम को ही अपनी विभूति में परिगणित किया है।

आज हमारे समाज में स्त्री पुरुष का पारस्परिक सम्बन्ध गोप्य समझा जाता है। गर्भाधान की चर्चा और वह भी संस्कार के उत्सव में पधारे हुए उपाध्याय या रिश्तेदारों के सन्मुख—स्त्री और पुरुष दोनों के लिये ही लज्जा का कारण समझा जाता है, किन्तु वास्तव में ऐसी चर्चा न गोप्य है न लज्जा का कारण ही। जब से समाज में इस वैदिक संस्कार का अभाव हुआ और उसका स्थान गोपनीयता ने लिया तब से ही अधिक विषय सेवन रूप व्यभिचार की बाढ़ सी आ गई। यदि आज फिर गर्भाधान को संस्कार रूप में करने की प्रथा प्रचलित हो तो समाज के बहुत से दोष स्वयं शान्त हो जाएं। और तब, जिस प्रकार विवाहित हो जाने पर, पर-स्त्री और पर पुरुष से सम्बन्ध रखना पाप समझा जाता है, यथा सम्भव नर नारी इससे बचने का प्रयत्न भी करते हैं, इसी प्रकार सन्तानोत्पत्ति के लिये गर्भाधान संस्कार के समय ही स्त्री पुरुष समागम किया करें, अतिरिक्त समय में नहीं, यही इस संस्कार का मुख्य अभिप्राय है। इसके अतिरिक्त इस संस्कार के निम्न उद्देश्य और कहे जा सकते हैं।