हिन्दू शास्त्रों में संसार के स्पृहणीय समस्त पदार्थों का वर्गीकरण करते हुवे उन्हें केवल चार भागों में विभक्त किया है। जिसे चतुर्वर्ग, कहा जाता है। उन चार पदार्थों के नाम हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन चारों पदार्थों को प्राप्त कराने वाले शास्त्र भी चतुर्विध हैं। जैसे मन्वादि स्मृतियें धर्मशास्त्र हैं। शुक्र, बृहस्पति, कणिक, कामन्दक, और चाणक्य आदि के ग्रन्थ अर्थशास्त्र हैं तथा उपनिषद् गीता आदि २ मोक्ष शास्त्र हैं, इसी प्रकार वात्स्यायन आदि महर्षियों के बनाये हुए 'कामसूत्र' आदि ग्रन्थ कामशास्त्र हैं।
प्राचीन समय में ऋषिकुल, गुरुकुलादि में २५ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत पूर्ण करके स्नातक होनेवाले छात्रों को अन्य विद्याओं की भांति आचार्य लोग इस रतिशास्त्र (Sexual Physiology) का भी उपदेश देते थे जिससे युवकवृन्द पहिले से ही गृहस्थाश्रम के आवश्यक नियमों से सुपरिचित हो जाते थे। किन्तु मध्यकाल में जब कि आश्रम प्रणाली समाप्त हो गई यह प्रथा भी जाती रही और धीरे २ देश दो दलों में विभक्त हो गया। एक दल उन राजा नवाब और रईसों का था जो विलासान्ध होकर दिन रात रंगरलियां मनाते थे। सुरा सुन्दरी का मादक नशा प्रति क्षण जिनकी आंखों में छाया रहता था और मंगलामुखियों के मुजरों से जिन्हें क्षण भर का भी अवकाश न मिलता था। दूसरा दल धार्मिक भावना प्रधान जनता का था और वह इस प्रकार के कृत्यों से सख्त घृणा करता था। मध्यकाल के तुलसी सूर मीरा आदि भारतीय सन्तों ने—जो कि जनता के सच्चे मार्ग प्रदर्शक थे—इन विलास प्रवृत्तियों के विरुद्ध बड़ा प्रचार किया, फल यह हुआ कि 'दूध का जला छाछ को फूंक २ कर पीता है' कहावत के अनुसार जनता, न केवल विलास से पराङ्मुख हुई, किन्तु उसने रति अथवा कामशास्त्र को—जिसे प्रजनन शास्त्र भी कहते हैं अश्लील और हेय समझना शुरू कर दिया। इस प्रकार चतुर्वर्ग के अन्यतम (काम) पदार्थ का विशुद्ध परिज्ञान उत्तरोत्तर समाप्त हो गया।
संस्कार प्रणाली तो लुप्त हो ही चुकी थी, तब पुरुषों को गर्भाधानादि का यथार्थ ज्ञान कैसे आता? आज भी हमारी यही स्थिति है। रति शास्त्र (Sexual Physiology) का वास्तविक ज्ञान देने वाली पुस्तकों का आज भी सर्वथा अभाव है। गृहस्थ में प्रवेश करने वाले युवक अपने आस पास के लोगों तथा विलासी युवकों से जैसा तैसा सुनकर या बाजार में बिकनेवाले अश्लील, कथित 'सचित्र कोकशास्त्रों' से—जो बाजारू औषधियों के विज्ञापन मात्र होते हैं और पुरुषों को पथभ्रष्ट करके विनाश के गहरे गर्त में गिरा देते हैं—ऊटपटांग ज्ञान प्राप्त करके अपना सर्वनाश कर बैठते हैं। विदेशों में रतिशास्त्र के ऊपर आजकल सैंकड़ों पुस्तकें निकल रही हैं। डा० पाइनकर, डा० विलसन, डा० हैविलाक ऐलिस, डा० प्लोटस, डा० बर्नार्ड एवं डा० फ्रैंकलिन आदि प्रख्यात लेखकों ने इस विषय को वैज्ञानिक रूप में जन साधारण के समक्ष उपस्थित करने का प्रयास किया है। 'What a husband out to know' Sexual questions, Before I wed' 'The Science of New life' 'Secrets of successful marriage' आदि २ पुस्तकों द्वारा वहां गृहस्थ में प्रविष्ट होनेवाले नवयुवकों को गृहस्थ का रास्ता दिखाया जाता है। इस प्रयत्न में वहां की जनता का कुछ उपकार ही हुआ है। परन्तु भारत में इस विषय की सच्ची शिक्षा देनेवाली जो पुस्तकें उपलब्ध हैं यदि भारतीय स्वयं उनसे सुशिक्षित होकर अपने गार्हस्थ्य जीवन को सुखी बनाने का प्रयत्न करें तो वह पुनरपि इस विषय में भी संसार का सच्चा नेतृत्व कर सकते हैं।
गर्भाधान संस्कार कराने वाले आचार्य को इस विषय का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये, इसलिये यदि यह प्रणाली पुनर्जीवित हो तो संस्कारार्थी को सब अपेक्षित सत्य ज्ञान गुरु से ही प्राप्त हो सकता है। अथवा इस संस्कार से पूर्व ही वह संस्कार सम्बन्धी योग्यता प्राप्ति के लिये इस विषय के ग्रन्थों द्वारा अपेक्षित ज्ञान लाभ कर सकता है। जिस प्रकार परीक्षा तिथि के निर्धारित हो जाने पर विद्यार्थियों की पढ़ाई में अधिक अभिरुचि उत्पन्न हो जाती है और वे उस दिन सफलता प्राप्त करने के लिये डटकर तैयारी करते हैं, इसी प्रकार मुहूर्त शास्त्रादि द्वारा गर्भाधान संस्कार का दिन नियत किया जाने पर संस्कारार्थी का उसके लिये यथेष्ट ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा पाना स्वाभाविक ही होगा और तब धार्मिक क्रिया के रूप में गर्भाधान के निष्पन्न करने पर भावी शिशु का धार्मिक भाव सम्पन्न, सत्पुत्र के रूप में उत्पन्न होना कुछ कठिन नहीं।