नारी विषयभोग की पूर्ति का साधन नहीं है, यह सृष्टि सौन्दर्य की पवित्र प्रतिमा है। विश्व की समस्त सुकुमार भावनाओं को उद्ग्रथित करके विधाता ने नारी की सृजन किया है। प्रेम, दया, माया, ममता धैर्य और कोमलता की अतुल राशि से उसका हृदय सर्वदा प्लावित रहता है। त्याग और आत्म समर्पण के सहज वरदानों को लेकर कुमारी रूप में उसका उदय होता है और मातृ रूप में पर्यवसान! 'माता' रूप में परिणति उसके जीवन की व्याख्या है। वह श्रद्धा की वस्तु है, विलास की नहीं। अतः जो व्यक्ति पुत्रोत्पत्ति के धार्मिक प्रयोजन के अतिरिक्त तथा स्त्री की इच्छा के प्रतिकूल भी अपनी विषय-लालसा को तृप्त करते रहते हैं, वे न केवल अपने अमूल्य स्वास्थ्य का नाश करते हैं अपितु स्त्री के साथ एक बड़ा अन्याय भी करते हैं।
गर्भाधान संस्कार स्त्री पुरुष की सहवास के लिए पारस्परिक सम्मति तथा सन्तान की आवश्यकता द्योतक संस्कार है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि सहवास के लिए स्त्री की सम्मति या सहमति कितनी आवश्यक है। स्त्री का शरीर स्वस्थ हो चाहे अस्वस्थ उसका मन प्रसन्न हो अथवा विषण्ण, आज के अधिकांश पति इसकी कोई परवाह न करते हुए बिना किसी पूर्व निश्चय के अपनी जघन्य वासना पूर्ति के लिये स्त्री को कष्ट में डालते हैं। सन्तान बाहुल्य से दुःखी निर्धन पुरुष, सन्तान की कोई इच्छा न रहते हुए भी, गर्भाधान में प्रवृत्त हो जाते हैं और इस क्षणिक आनन्द का तात्पर्य होता है एक और बालक,—जिसकी कि परिवार में कोई आवश्यकता नहीं थी। अन्त में गरीबी और भूख से तंग आकर या तो बालक ही तड़फ २ कर मर जाते हैं या विलासान्ध पति महाशय को आत्महत्या का द्वार खटखटाना पड़ता है। यह सब क्यों होता है? गर्भाधान प्रथा के लुप्त होने के कारण ही तो!
वर्तमान काल की अनेक भ्रूण हत्याओं और गर्भ निरोधक औषधियों के अन्धाधुन्ध प्रचार का कारण क्या इस संस्कार का लुप्त हो जाना ही नहीं है? यदि आज समाज में इस संस्कार-पूर्वक ही गर्भाधान का प्रचार हो, तो—न तो बेकारी के समय में अनायास ही जनसंख्या के बढ़ने की शिकायत रहे और न पुरुषों की स्वेच्छाचारिता पूर्ण प्रवृत्ति से त्रस्त तथा पददलित नारियों के आन्दोलन का सवाल,—जो आज पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने के लिये नारियों द्वारा चलाया जा रहा है।