सनातनधर्मियों के समस्त क्रिया कलाप किसी मुहूर्त में होते हैं। मुहूर्त का तात्पर्य है—सर्वथा उपयुक्त काल। दूसरे शब्दों में एक ऐसा समय—जो उस कार्य के लिये वैज्ञानिक दृष्टि से बिल्कुल पूरा उतरे। इस उपयुक्तता का निर्धारण साधारण मानवों की बुद्धि से नहीं किन्तु प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित ज्योतिष शास्त्र (Astronomy) के द्वारा होता है।
स्त्री समागम के लिये शास्त्रों की आज्ञा है कि—
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा।
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया॥
अर्थात्—पुरुष को चाहिये पर्वादि रहित ऋतुकाल में धर्म-कामना पूर्वक स्वकीय भार्या से ही समागम करे। संस्कार विषयक मुहूर्त का विचार करते हुए पारस्कर गृह्य-सूत्रकार ने लिखा है—
"ऋतुकाले रजोदर्शने सञ्जाते चतुर्थादि समदिने ज्योतिःशास्त्रोक्ते पुण्याहे, कन्यार्थी पञ्चमादिविषमदिने गर्भाधानं कुर्यात्। (पारस्कर गृह्य सूत्र)
अर्थात्—ऋतुकाल में, रजोदर्शनोपरान्त ऋतुस्नाता हो चुकने पर चौथे दिन, अष्टमी चतुर्दशी अमावस्या पूर्णिमा संक्रान्ति आदि पर्वकाल रहित ज्योतिष शास्त्रोक्त शुभ समय में गर्भाधान करे।
गृह्य-सूत्र के उपरोक्त विधान में 'ज्योतिषशास्त्रानुमोदित शुभ समय' का निर्देश करके मनुष्य की अबाध विलास प्रवृत्ति को संकुचित एवं सीमित करके जहां मानव स्वास्थ्य को समुन्नत करने का प्रयत्न किया गया है वहां वैज्ञानिक दृष्टि से गर्भाधान के लिये उपयुक्त समय का संकेत भी किया गया है। इस विषय में मनु याज्ञवल्क्य आदि स्मृतिकारों ने बड़ा सूक्ष्म और गहन विचार किया है। मनु लिखते हैं—
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्विगर्हितैः॥
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितैकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दश रात्रयः॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु।
तस्माद् युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम्॥
(मनु० ३, ४६-७८)
अर्थात्—स्त्रियों का स्वाभाविक ऋतुकाल रजोदर्शन के दिन से आगे १६ रात्रियें कहा गया है। इनमें प्रथम चार रात्रियें अतीव निन्दित हैं, इनमें सहवास तो क्या रजस्वला के हाथ का स्पर्श किया जल भी न पीना चाहिये। पहली चार रात्रियों के अतिरिक्त ग्यारहवीं और तेरहवीं रात्री भी निन्दित है। शेष दश रात्रियें प्रशस्त हैं। पुत्राभिलाषी पुरुष युग्म—अर्थात् छठी आठवीं दशवीं बारहवीं चौदहवीं और सोलहवीं रात्रि में स्त्री समागम करे इसी प्रकार कन्याभिलाषी पुरुष अयुग्म—पांचवीं सातवीं आदि शेष रात्रियों में गर्भाधान करे।
मनु के उपरोक्त उद्धरण से यह भलीभांति ज्ञात हो जाता है कि आज से हजारों लाखों वर्ष पूर्व जबकि शेष संसार अर्ध सभ्य अवस्था में नितान्त पशु तुल्य जीवन बिता रहा था तब भारतीय महर्षि अपनी सुदीर्घ तपश्चर्या तथा विज्ञानमय विश्लेषण द्वारा मानव जीवन की प्रत्येक दिशा में परीक्षण (Experiment) करने में लगे हुए थे। जीवन का कोई कोना ऐसा नहीं है जहां उनकी पैनी दृष्टि का प्रसार न हुआ हो। मानव जीवन के सभी पहलुओं पर उन्होंने विशद विचार किया है और तब जो सिद्धान्त और नियम उन्होंने स्थिर किये हैं वे कितना महत्त्व रखते हैं—यह कहने की आवश्यकता नहीं।