भौतिक विलास परिपूर्ण आधुनिक जगत् में उपरोक्त प्रश्न कोई आश्चर्य नहीं है। Eat drink and be marry या 'यावज्जीवेत्सुखं जीवेत्' जैसी सुन्दर एवं सरल फिलासफी के मुकाबले मनु के उपरोक्त विधि निषेधमय नियम, ज्वरार्त प्राणी के सामने से हलवे की तश्तरी हटाकर कड़वी कुनैन देने के समान हैं और तब रोगी का, ऐसा करने वाले वैद्य और घरवालों के प्रति क्षोभ, असहिष्णुता, समर्थ होने पर आज्ञोल्लंघन भी स्वाभाविक ही है। आज यही दशा हमारे सामने है। लोग कहते हैं—धर्म ने मनुष्य की सब प्रकार की स्वतन्त्रता का अपहरण करके उसे कैदी बना दिया है। उसके सभी क्रियाकलापों पर सदा धर्म का अंकुश झूलता रहता है। खाना पीना सोना उठना बैठना—गर्ज यह कि सभी कार्यों में अदृष्ट प्रेत की छाया की भांति धर्म उसके पीछे लगा रहता है। आखिर यह सब क्यों? धर्म मनुष्य के लिये है न कि मनुष्य धर्म के लिये। इस प्रकार के विचार आज सर्वत्र सुनने को मिलते हैं। ऐसी दशा में उपरोक्त प्रश्न का समाधान आवश्यक ही नहीं अत्यावश्यक है।

पर्वादिकों में सहवास निषेध के रहस्य को समझने से पूर्व हमें निम्न लिखित पांच बातों को बुद्धि में उतार लेना चाहिये, जिससे प्रतिपाद्य समाधान को अनायास ही समझ सकें।

(१) भूगोल विद्या (Physical Zography) के अनुसार चन्द्रमा जलीय संघातों का, जिन्हें रस कहा जाता है—एक बहुत बड़ा पिण्ड है।

(२) हमारे शरीर में विद्यमान खून तथा प्राण—जो कि जीवन के मुख्य हेतु हैं—जल के विकार से बने हुए द्रव्य हैं, जैसा कि उपनिषद् के निम्न उद्धरण से भली भांति ज्ञात हो सकता है।

आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः।
(छान्दोग्य उप० ६।५)

अर्थात्—मनुष्य जिस जल को पीता है उसका सब से स्थूल भाग मूत्र बन जाता है, उससे सूक्ष्म भाग रक्त बन जाता है और सब से सूक्ष्म भाग प्राण होता है।

(३) चन्द्रमा की उत्पत्ति विराट् के मुख से हुई है जैसा कि

चन्द्रमा मनसो जातः (यजु)

—इस मन्त्र से भली भांति जाना जा सकता है।

(४) भूमण्डल की उन सभी वस्तुओं पर जिन में जलीय अंश रहता है चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है, उदाहरणतया सभी औषधि वनस्पति आदि चन्द्रमा से ही रस को प्राप्त कर बढ़ती हैं इसीलिये चन्द्रमा को औषधीश कहा जाता है।

(५) पार्थिव जल संघात—समुद्र पर चन्द्रमा का यह प्रभाव अमावस्या तथा पौर्णिमा के दिन दीर्घ ज्वार (Spring tide) के रूप में तथा अष्टमी को लघु ज्वार (Neap tide) जल के उतार के रूप में स्पष्ट दिखलाई पड़ता है।

उपरोक्त तथ्यों को हृदयंगम कर लेने के बाद यह बात सरलता से समझ में आ सकती है, कि शास्त्रकारों ने पर्व आदि काल में गर्भाधान तथा स्त्री समागम का निषेध क्यों किया है। पर्व से शास्त्र का अभिप्राय अमावस्या पौर्णिमा चतुर्दशी अष्टमी तथा संक्रान्ति में है। इनमें पूर्णिमा अमा, तथा दोनों चतुर्दशी इन चार तिथियों में चन्द्रमा सूर्य और पृथ्वी एक ही सीधी रेखा में होते हैं। चन्द्रमा और सूर्य के एक ही रेखा में होने से दोनों का सम्मिलित आकर्षण अन्य दिनों से अधिक होता है और उसका प्रभाव भूमण्डल के अन्य पदार्थों की भांति मानव शरीर पर भी विशेष रूप से पड़ता है।

हम पीछे बतला चुके हैं कि हमारे प्राण तथा रक्त, जलीय विकार से उत्पन्न पदार्थ हैं, इसलिये इन पर उसका विशेष प्रभाव होता है। इन तिथियों में शरीरस्थ रस, रक्त, प्राण, क्षुब्ध तथा उत्तेजित होते हैं, उनकी गति स्वाभाविक स्तर से विशेष बढ़ी हुई होती है। इसी प्रकार शुक्ल तथा कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चूंकि सूर्य और चन्द्र एक दूसरे के साथ समकोण बनाने की अवस्था में होते हैं, फलतः उनकी आकर्षण शक्तियों का परस्पर संघर्षण हो जाता है और चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति स्वाभाविक स्तर से निम्न हो जाती है, इसलिये इन तिथियों में पार्थिव द्रव्यों पर चन्द्रमा का प्रभाव स्वाभाविक अनुपात से कम होता है। इसका प्रभाव मानव शरीर पर भी पड़ता है उस समय शरीरान्तर्वर्ती रस रक्त तथा प्राणों में ह्रास एवं निर्बलता आ जाती है। पूर्णिमा आदि पर रसों में अतिशय वृद्धि और अष्टमी पर ह्रास को देखने के लिये बम्बई या कलकत्ता में समुद्र के किनारे चले जाइये। इन समयों में प्राकृतिक प्रेरणा से ही उठने वाले दीर्घ ज्वार और लघु ज्वार को देखकर आप स्वयं ही इसकी सचाई के कायल हो जायेंगे।

तात्पर्य यह है कि इन पर्व तिथियों पर मनुष्य के प्राण तथा रक्तादि स्वाभाविक दशा में नहीं होते। चन्द्र-प्रभाव-जन्य चढ़ाव एवं उतार से वे विषम अवस्थापन्न होते हैं, अतः ऐसे समय में समागम करने से जहां स्वास्थ्य वैषम्य से प्राण शक्ति क्षीण हो सकती है, वहां समागम से गर्भ स्थिति हो जानेपर भावी शिशु के शरीर में रक्त विकार तथा प्राणशक्ति दौर्बल्यादि दोषों का रह जाना आश्चर्यकारक न होगा। वह बालक सम्पूर्ण आयु फोड़ फुन्सी दाद आदि रक्त विकारों से तथा प्राण शक्ति की दुर्बलता से होनेवाली हृदय दौर्बल्य (Heart weakness) आदि व्याधियों को भोगता हुआ अपने माता पिता के अज्ञान का फल चखता रहेगा।

इसके अतिरिक्त क्योंकि चन्द्रमा विराट् भगवान् के मन से उत्पन्न हुआ है और समस्त चराचर के प्राणियों के मन समूह का एकमात्र अधिष्ठाता है, इसलिये उसके वृद्धि क्षय के तारतम्य से मनुष्यों के मन की अवस्था भी बदलती रहती है। पर्वकाल में रस रक्त तथा प्राण के साथ २ मनुष्य का मन भी स्वाभाविक दशा में नहीं होता। ऐसे समय में गर्भाधान से उत्पन्न होने वाले बालक अतिशय क्रूर, साहसी चारित्र्यहीन चञ्चल या अत्यन्त कायर डरपोक और धैर्यहीन होते हैं। इसलिये ऐसे समय में कभी स्त्री प्रसंग न करना चाहिये।