श्री मनु जी महाराज ने पुत्राभिलाषी पुरुषों के लिये युग्म अर्थात्—छठी आठवीं, दशवीं, बारहवीं, चौदहवीं और सोलहवीं रात्रि में, एवं कन्याभिलाषी पुरुषों के लिये अयुग्म—अर्थात् पांचवीं सातवीं पन्द्रहवीं आदि रात्रियों में स्त्री प्रसंग का विधान किया है। प्रसंगानुसार इस विषय पर भी विचार करना अनुपयुक्त न होगा।
सन्तति शास्त्र (Sexual physiology) के सभी विद्वान्—चाहे वे पौरस्त्य हों या पाश्चात्य, इस विषय में कम से कम एक मत हैं, कि वीर्य के आधिक्य से पुत्र और रज की प्रबलता से कन्या उत्पन्न होती है जैसा कि मनुजी महाराज ने कहा है—
पुमान् पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः (मनु ३)
अर्थात्—पुरुष के अधिक वीर्यवान् होने से पुत्र और स्त्री के आर्तवाधिक होने से कन्या का जन्म होता है। किन्तु कब स्त्री के शरीर में रज की प्रबलता होती है और कब वह ह्रास को प्राप्त हुआ रहता है यही एक रहस्य है जिसे केवल क्रान्तद्रष्टा भारतीय महर्षियों ने ही जाना और तदनुकूल विविध नियमों की रचना की। विदेशों में इस सम्बन्ध में जो नए सिरे से खोजें हुई और हो रही हैं वे यद्यपि नितान्त अधूरी हैं किन्तु उनसे प्रतीत होता है कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा कि वे लोग, तपोधन ऋषियों द्वारा बतलाये गये प्रजनन शास्त्र के तथ्यों को अन्तिम रूप में स्वीकार करने को बाध्य होंगे।
इन तथाकथित परीक्षणों अनुसंधानों और उन पर निर्धारित अधकचरे सिद्धान्तों के वर्णन जब हम इन लेखकों की पुस्तकों में पढ़ते हैं तो हमें बड़ी हंसी आती है और साथ ही दया भी। उस समय बलात् मुख से निकल पड़ता है—काश? ये लोग संस्कृत साहित्य से परिचित होते!
हमें पिछले दिनों अमेरिका के सुप्रसिद्ध सन्तति शास्त्र वेत्ता डा० ट्राल (Dr. Tral) की इस विषय की एक पुस्तक देखने का अवसर प्राप्त हुआ। आपने उसमें एक स्थान पर लिखा है "१५-वर्ष पूर्व मैंने यह नियम प्रकाशित किया था, जिसका परीक्षण हजारों व्यक्तियों पर किया जा चुका है। वह नियम है—'रज बन्द हो जाने के पश्चात् एक प्रकार का आर्तव स्त्री के गर्भाशय से निकलना आरम्भ होता है और दश बारह दिन तक जारी रहता है। यदि बन्द हो जाने के दिन से लेकर दश या बारह दिनों के मध्य समागम न किया जाय तो गर्भस्थिति कभी न होगी।
पाठकों से यह बात छिपी न होगी कि डा० ट्राल जिसे अपने द्वारा १५ वर्ष पूर्व निश्चित किया नया आविष्कार कह रहे हैं वह सहस्रों वर्ष पूर्व मनु आदि स्मृतिकारों द्वारा निर्दिष्ट 'ऋतु काल' के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार आगे चलकर 'क्या इच्छानुसार लड़का या लड़की उत्पन्न की जा सकती है' विषय पर विचार करते हुए आप लिखते हैं—
'हमारी वर्तमान विद्या सम्बन्धी दशा हमें एक मार्ग बताती है और वह यह है कि हम ऋतुकाल के अनुसार चलें। बहुतायत से साक्षियें इस बात को मिलती हैं, कि पहिले दिनों में गर्भाधान से लड़कियां और पिछले दिनों समागम से लड़के होते हैं।'
उपरोक्त उद्धरण का सीधा सा तात्पर्य यही हो सकता है कि डा० ट्राल या उन सरीखे दूसरे वैज्ञानिकों के मतानुसार प्रारम्भ के आठ दश दिनों में स्त्री के शरीर में रज की प्रबलता होती है और बाद के दिनों में वह ह्रास को प्राप्त हो जाता है और तब पुरुष वीर्य के प्रबल होने के कारण लड़के उत्पन्न हुआ करते हैं। हमें इन अपूर्ण सिद्धान्तों की आलोचना करके पाठकों का समय खोने या कागज काले करने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। वे पहिले दिन कौनसे होते हैं और पिछले कौन से यह तो वे वैज्ञानिक ही जानें या साक्षी देनेवाले। इस उद्धरण से हमें तो इतना ही प्रयोजन है, कि वे लोग भी कम से कम इस बात से तो सहमत हैं कि कुछ समय—वह चाहे पहिला हो या बाद का या अन्य कोई—ऐसा अवश्य होता है जब स्त्री शरीर में आर्तव का वेग अधिक बढ़ा हुआ होता है और कभी वह घटा हुआ।
अब मनु विहित युग्म-अयुग्म-रात्रि-व्यवस्था पर विचार कीजिये उपरोक्त व्यवस्था का तात्पर्य यही है कि रजोदर्शन से शुद्ध हो जाने के अनन्तर स्त्री के शरीर में आर्तव वृद्धि के साथ एक प्रकार की तरंग उठती है जिसे 'मदन तरंग' भी कहा जाता है। इसका वेग एक दिन अधिक होता है और एक दिन कम, जैसे—एकान्तर ज्वर ठीक एक दिन बीच में छोड़ कर अगले दिन होता है यह प्रायः सभी भुक्त भोगी जानते हैं। ठीक इसी प्रकार यह 'मदन तरंग' समझनी चाहिये। तात्पर्य यह है कि पांचवीं रात्रि से आगे एक एक रात्रि को छोड़ कर—पांचवीं, सातवीं, नवीं—आदि अयुग्म रात्रि में इसका वेग बढ़ा हुआ होता है जिससे स्त्री के शरीर में बल अधिक होता है और तब—'युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु' मनु के इस नियम के अनुसार उपरोक्त रात्रियों में समागम से कन्या जन्म होता है और इससे भिन्न समय में स्त्री का आर्तव निर्बल होता है इससे उनमें संयोग से पुत्र की उत्पत्ति होती है।
प्रस्तुत पुस्तक लेखन काल में ली गई ५० साक्षियों में ४० ऐसी थीं जिनमें उपरोक्त सिद्धान्त की यथार्थता का समर्थन पाया गया है। ५ व्यक्ति ऐसे थे जो गर्भ स्थिति का यथार्थ समय न जान सके, २ गर्भस्राव के कारण पूर्ण समर्थक न हो सके और ३ मामले इसके विरुद्ध मिले। इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय महर्षियों द्वारा आविष्कृत 'युग्मायुग्मरात्रि-व्यवस्था' नितान्त पूर्ण और शारीरिक विज्ञान की भित्ति पर अवलम्बित है। इसके पालन से आज भी उतना ही लाभ उठाया जा सकता है जितना कि पूर्वकाल में लोग उठाते थे। इसके साथ ही हमें यह आशा करनी चाहिये कि अवश्य ही पाश्चात्य विज्ञान अपनी अन्तिम खोजों के बाद इसी परिणाम पर पहुँचने को बाध्य होगा।