गर्भाधान संस्कार में प्रसंगवश रजस्वला स्त्री के विषय में कुछ लिखना अप्रासंगिक न होगा। रजस्वला स्त्री के विषय में शास्त्रकारों ने लिखा है—
एवं शुद्धशुक्रार्तवा ऋतौ प्रथमदिवसात् प्रभृति ब्रह्मचारिणी दिवास्वप्नाञ्जनाश्रुपातस्नानानुलेपनाभ्यंगनखच्छेदनप्रधावनहसनकथनातिशब्दश्रवणावलेखनात्यायासान् परिहरेत्।
अर्थ—इस प्रकार रजस्वला स्त्री को चाहिये, कि ऋतुकाल के पहिले दिन से ही ब्रह्मचारिणी होकर रहे। दिन में शयन न करे, आंखों में काजल न डाले, रोवे नहीं। स्नान करना, चन्दन अथवा उबटन लगाना, तेल मालिश, नख छेदन, दौड़ना, हंसना, अधिक बोलना, भयंकर शब्द सुनना, केश संस्कार, उग्र वायु सेवन तथा परिश्रम, इन सब से यथाशक्ति दूर रहे।
उपरोक्त शास्त्रीय वचन के अनुसार भारतवर्ष में अभी तक यही परिपाटी प्रचलित रही है। इन दिनों में स्त्रियों को अस्पृश्य समझा जाता था। उन्हें सभी घरेलू कार्यों से अवकाश रहता था यहांतक कि उनका छुआ जल भी लोग नहीं पीते थे, किन्तु समय के साथ आज अवस्था बदल रही है। प्रत्यक्षवादी जनसमुदाय आज इस वैज्ञानिक बन्धन को दूर फेंक कर अपने मनमाने आचार विचारों का पालन करना चाहता है। विशेषतया शहरों में निवास करने वाली आजकल की बाबू पार्टी—जिनको ९ बजे ही दफ्तरों की हाजरी बजानी होती है—इस वैज्ञानिक व्यवस्था को असुविधा मूलक होने कारण मानने के लिए कतई तैयार नहीं है।
इसलिए इस स्तम्भ में हम इस सम्बन्ध के क्यों पर ही प्रकाश डालना चाहते हैं, जिससे पथभ्रष्ट होती हुई निरीह जनता का मार्ग प्रदर्शन हो सके।
'रजोदर्शन क्या है'?—इस विषय का विवेचन करते हुए पीयूषपाणि भगवान् धन्वन्तरि ने लिखा है—
मासेनोपचितं काले धमनीभ्यां तदार्तवम्।
ईषत्कृष्णं विगन्धं च वायुर्योनिमुखं नयेत्॥
(सुश्रुत शारीरस्थान अ० ३ वाक्य ८)
अर्थात्—स्त्री के शरीर में वह आर्तव (एक प्रकार का रुधिर) एक मास पर्यन्त इकट्ठा होता रहता है। उसका रंग काला पड़ जाता है। तब वह धमनियों द्वारा स्त्री की योनि के मुख पर आकर बाहर निकलना प्रारम्भ होता है इसीको रजोदर्शन कहते हैं।
रजोदर्शन की उपरोक्त व्याख्या से हमें ज्ञात होता है कि स्त्री के शरीर से निकलने वाला वह रक्त काला तथा दुर्गन्धयुक्त होता है। अणुवीक्षणयन्त्र द्वारा देखने पर उसमें कई प्रकार के विषैले कीटाणु पाये गए हैं। दुर्गन्धादि दोषयुक्त होने के कारण उसकी अपवित्रता तो प्रत्यक्ष सिद्ध है ही। इसलिए उस अवस्था में जब कि स्त्री के शरीर की धमनियें इस अपवित्र रक्त को बहाकर साफ करने के काम पर लगी हुई हैं और उन्हीं नालियों से गुजर कर शारीरिक रोमों से निकलने वाली ऊष्मा तथा प्रस्वेद के साथ रज कीटाणु भी बाहर आ रहे होते हैं, तब यदि स्त्री द्वारा छुए हुए जलादि में वे संक्रमित हो जाए तथा मनुष्य के शरीर पर अपना दुष्प्रभाव डाल दे, तो इसमें क्या आश्चर्य? हस्पतालों में हम प्रति दिन देखते हैं कि डाक्टर अक्सर ड्रेसिंग का कार्य करने से पूर्व और पश्चात् अपने हाथों तथा नश्तर आदि को—हालांकि वे देखने में साफ सुथरे होते हैं—साबुन तथा गर्म पानी से अच्छी तरह साफ करते हैं। आपने कभी सोचा—ऐसा क्यों किया जाता है? एक मूर्ख की दृष्टि में तो यह सब, समय साबुन और पानी के दुरुपयोग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, किन्तु डाक्टर जानता है कि यदि वह ऐसा न करे तो न जाने वह कितने व्यक्तियों की हत्या का कारण बन जाये। इसी सिद्धान्त को यहां लीजिए और तब विचार करें कि उस दुर्गन्ध तथा विषाक्त कीटाणु युक्त रक्त के प्रवहण काल में स्त्री द्वारा छुई हुई कोई वस्तु क्यों न हानिकारक होगी?
'भारतीय मैडीकल ऐसोसियेशन' नवम्बर १९४९ के अङ्क में हमें डा० रेड्डी तथा डा० गुप्ता का लेख देखने का अवसर प्राप्त हुआ है जिसमें बतलाया गया है कि पाश्चात्य डाक्टरों ने भी रजस्वला के स्राव में विषैले तत्त्वों का अनुसन्धान किया है। १९२० में डा० सेरिक ने अनुभव किया कि कुछ फूल रजस्वला के हाथ में देते ही मुरझा जाते हैं १९२३ में डा० मिकबर्ग और पाइके ने यह खोज निकाली, कि रजस्वला स्त्री का प्रभाव पशुओं पर भी पड़ता है, उन्होंने देखा है कि उसके हाथ में दिये हुए मेंढक के हृदय की गति मन्द पाई गई। १९३० में डा० लेनजो भी इसी परिणाम पर पहुँचे और उन्होंने अनुभव किया कि कुछ काल तक मेंढक को रजस्वला के हाथ पर बैठा रखने से मेंढक की पाचन शक्ति में विकार आ गया। डा० पालेण्ड तथा डील का मत है कि यदि खमीर, रजस्वला स्त्री के हाथों से तैयार कराया जाय तो कभी ठीक नहीं उतरता। यह सब तो दूर के सूक्ष्म विश्लेषणात्मक अनुभव हैं। हम इस विषय के कुछ स्थूल अनुभवों का निर्देश करते हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति जब कभी चाहे स्वयं करके देख सकता है। रजस्वला स्त्री के स्पर्श का तो कहना क्या यदि अचार पर उसकी छाया तक भी पड़ जाये तो वह बिगड़ जाता है। तुलसी के हरे भरे पौधों को आप रजस्वला द्वारा एक दो बार स्पर्श करवा दीजिये, आप देखेंगे कि वह उसी समय से मुरझाना प्रारम्भ कर देंगे और एक मास के अन्दर २ अवश्य सूख जायेंगे।
इसके अतिरिक्त स्त्री के स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उसको सम्पूर्ण कार्यों से अवकाश मिला रहना नितान्त आवश्यक है। वैद्य या डा० जब किसी को विरेचन अर्थात् जुलाब देते हैं तब उसे परिश्रम करने उग्रवायु सेवन तथा स्नानादि से बिलकुल रोक देते हैं। वह पुरुष आराम से बैठा रहता है और शरीर की आभ्यन्तरिक सफाई के इस कार्य को पूरा करता रहता है इसका कारण यह है कि उस समय जब कि शारीरिक प्रकृति शरीर में से मल निकालने के कार्य में लगी हुई है, यदि इस प्रकृति या मनोवृत्ति को किसी अन्य तरफ लगाया गया या जायगा तो मल रुक जावेगा। मानव शरीर में रक्त का दबाव बहुत कुछ मानसिक दशा के ऊपर निर्भर है, क्योंकि हम देखते हैं कि भली भांति खाने पीने पर भी मानसिक चिन्ता के कारण मनुष्य का शरीर निर्बल पड़ता जाता है, और इसके विपरीत खाने पीने के अच्छा न होने पर भी मन को प्रसन्न रखने मात्रसे शरीर स्वस्थ रहता है। अतः किसी अन्य कार्य में मन को लगाने पर रक्त का दबाव उसी तरफ बढ़ेगा और तब उस रक्त में मल का अंश निश्चित ही अवशिष्ट रह जायेगा जो कि आगे चलकर उस अंग में विकार पैदा कर रोग का कारण बन सकता है।
रजोदर्शन भी एक प्रकार से स्त्री के लिए प्रकृतिप्रदत्त विरेचन है। ऐसे समय में उसे पूर्ण विश्राम करते हुए इस कार्य को पूरा होने देना चाहिए। यदि ऐसा न होगा तो इसका दुष्परिणाम जहां वह जन्म भर भोगेगी, वहां भावी सन्तान को भी विरासत में इस प्रकार के पुरस्कार सौंपेगी कि सन्तान भी सदा अपनी बुद्धिमती माता के गुणगान करती रहे।
जरा धन्वन्तरि जी के शब्दों में उन चीजों के नमूने तो देखिये जो ऐसी माताएं—अपने बालकों को सौंपती हैं—
दिवा स्वपंत्याः स्वापशीलो अंजनादंधो रोदनाद्विकृतदृष्टिः स्नानानुलेपनाद् दुःखशीलस्तैलाभ्यंगात्कुष्ठी, नखकर्तनात् कुनखी, प्रधावनाच्चञ्चलो हसनाच्छ्यावदन्तौष्ठतालुजिह्वः प्रलापी चातिकथनादतिशब्दश्रवणाद् बधिरो अवलेखनात्खलतिः मरुतायाससेवनान्मत्तो गर्भो भवतीत्येवमेतान् परिहरेत्।
(सुश्रुत शरीरस्थान अध्याय २-५)
अर्थात्—यदि रजस्वला स्त्री दिन के समय सोए, और कदाचित् उसे उस ऋतुकाल में गर्भ रह जाए तो, भावी शिशु बहुत सोने वाला उत्पन्न होगा। काजल लगाने से अन्धा, रोने से विकृतदृष्टि स्नान और अनुलेपन से शारीरिक पीड़ा युक्त, तेल मलने से कोढ़ी, नाखून काटने से बुरे नाखूनों वाला, दौड़ने से चंचल, हंसने से काले दांतों, काले ओष्ठ विकृत जिह्वा तथा तालु वाला, बहुत बोलने से बकवादी, भयङ्कर शब्द सुनने से बहरा, कंघा आदि से बाल संवारने से गंजा, अधिक वायु सेवन से व परिश्रम करने से पागल बालक उत्पन्न होता है। इसलिए रजस्वला स्त्री इन्हें न करे।
कितने शोक की बात है, कि माता पिता पहिले तो इन बातों पर ध्यान नहीं देते। या यों कहिए इनका जानना भी आवश्यक नहीं समझते, किन्तु जब घर में इस प्रकार के बालक का जन्म हो जाता है तब भाग्य को कोसते हैं।
इसके आगे धन्वन्तरी भगवान् ने लिखा है कि—
ततः शुद्धस्नाता चतुर्थे अहन्यहतवाससमलंकृतां कृतमंगलस्वस्तिवचनां भर्तारं दर्शयेत्, कस्य हेतोः—
पूर्वं पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमंगना।
तादृशं जनयेत्पुत्रं भर्तारं दर्शयेदतः॥
अर्थ—ऋतुस्नाता स्त्री को चौथे दिन सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहिना कर मंगलाचरण तथा स्वस्तिवाचन पूर्वक कुल-वैद्य या गुरु, पति का दर्शन करावे। ऐसा क्यों किया जाए? इसलिये कि—
ऋतु स्नान के अनन्तर स्त्री जैसे पुरुष का प्रथम दर्शन करती है उसके उसी प्रकार की सन्तान उत्पन्न होती है।
इसलिए यह आवश्यक है, कि गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व नवयुवक और नवयुवतियां इन तथ्यों से पूर्णतया परिचित हो जायें और इनका कठोरता से पालन करें। यह तभी हो सकता है जब कि पुनः वैदिक संस्कार प्रणाली प्रचलित हो और गर्भाधान संस्कार काल में गृहस्थ स्त्री पुरुषों को इन वस्तुओं का ज्ञान कराया जावे।