(क) पुमाँसौ मित्रावरुणौ पुमाँसावश्विनावुभौ पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे।

(ख) पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः। पुमाँसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताम्। (साम० मं० ब्रा० १।४।९)

अर्थात्—(क) मित्रावरुण नामक दोनों देवता, पुरुष हैं। अश्विनी कुमार नामक दोनों देवता पुरुष हैं और अग्नि वायु ये दोनों भी पुरुष हैं। तुम्हारे गर्भ में भी पुरुष का आविर्भाव हुआ है। (ख) अग्नि देवता भी पुरुष हैं और देवराज इन्द्र भी पुरुष है। देवताओं का गुरु बृहस्पति भी पुरुष है तेरे भी पुरुषत्वयुक्त पुत्र ही उत्पन्न हो।

पुंसवन संस्कार में पढ़े जाने वाले उपरोक्त सामवेद के मन्त्रों से स्पष्ट ज्ञात होता है, कि यह संस्कार 'गर्भ से पुरुष सन्तान ही उत्पन्न हो' इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए है।

'अथ पुंसवनम्। पुरास्यन्दत इति मासे द्वितीये तृतीये वा'—पारस्कर गृह्य सूत्र के इस वचन के अनुसार यह संस्कार उस समय किया जाता है जब कि गर्भ दो मास अथवा तीन मास का हो, दूसरे शब्दों में जब कि गर्भ मांस का एक पिण्ड मात्र हो और उसमें स्त्री पुरुष विभेदक अंगों का प्रत्यक्ष प्रादुर्भाव नहीं हुआ होता। शारीरिक विज्ञान (Physical Scince) के अनुसार तीसरे चौथे महीने के बाद ही गर्भाशय में शिशु के स्त्री पुरुष विभेदक अंगों का बनना प्रारम्भ होता है। इसलिए यह संस्कार इस समय से पूर्व ही किया जाता है।

देखा गया है कि प्रायः सभी देशों में माता पिता, कन्या की अपेक्षा पुत्र को अधिक महत्व देते हैं। पुत्र होने पर भांति २ के उत्सव मनाये जाते हैं और सभी व्यक्ति यथाशक्ति दानादि करते हैं … [एक पंक्ति स्कैन में कटी हुई]

'पुं-नरकं ततस्त्रायते इति पुत्रः'

—इस यास्कोक्त वचन के अनुसार श्राद्धतर्पणादि द्वारा पितरों का उद्धारक कहा जाता है—सभी माता पिता पुत्र उत्पन्न हो जाने पर ही अपने जीवन को सफल समझते हैं। घरमें अनेक कन्याओं के होने पर भी पुत्र के अभाव में स्त्रियें पुत्र प्राप्ति के लिए अनेक प्रकार के व्रत अनुष्ठान कराती हैं मनौती मानती हैं और तरह २ की औषधि सेवन करती हैं। इसलिए समय पर इस संस्कार का विधान करके प्राचीन महर्षियों ने गृहस्थ नर नारियों की स्वाभाविक पुत्रैषणा को पूरा करने का प्रयत्न किया है।