माता के इस प्रकार के सद्विचारों का बालक के निर्मल स्वच्छ एवं अछूते हृदय पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। उसका नवोदित हृदय, नई मानसिक शक्ति और नवोन्मेषिणी बुद्धि मातृ हृदय से शुभ विचारों का सम्बल पाकर कितनी सरलता से विकसित हो सकेगी और दर्पण के समान निर्मल तथा स्वच्छ हृदय पर पड़ी हुई विचार रेखायें उसके सम्पूर्ण जीवन में कैसी अक्षुण्ण बनी रहेंगी—इसे सभी व्यक्ति भलीभांति समझ सकते हैं। हमारे प्राचीन इतिहास में इस प्रकार की घटनाओं की कमी नहीं जिनमें माता की गर्भावस्था की भावना के सर्वथा अनुरूप ही बालकों ने जन्म लेकर इस संस्कार की वैज्ञानिक लक्ष्यभूत भावना को सिद्ध कर दिया है। महाभारत में अभिमन्यु सम्बन्धी ऐसी ही एक रोचक कथा का उल्लेख मिलता है।
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महाभारत का युद्ध अपने पूर्ण यौवन पर था। दोनों ओर के सहस्रों लाखों सैनिक प्रतिदिन नर मेध की उस भीषण ज्वाला में अपनी आहुति दे देते थे। चारों ओर विनाश का महाताण्डव था। भाई भाई के हृदय में वर्षों से संचित द्वेष और दर्प मानो ज्वालामुखी बनकर एक दूसरे को निगलने के लिये तत्पर हो। ऐसे समय में दुर्योधन के अत्यधिक आग्रह पर द्रोणाचार्य ने 'चक्रव्यूह' की स्थापना की। उस दिन भाग्यवशात् अर्जुन अपने शिविर में न थे। भगवान् कृष्ण के साथ वे संसप्तकों के साथ युद्ध करने गए हुए थे। जब पाण्डवों को चक्रव्यूह का समाचार मिला तो वे बड़े हैरान हुए। अर्जुन के अतिरिक्त पांचों पाण्डवों में कोई ऐसा न था जो चक्रव्यूह का भेदन कर सके।
अब क्या होगा ? क्या चक्रव्यूह पाण्डवों की पराजय का कारण बन जायेगा ? यह विचार करते २ युधिष्ठिर एक गहन निराशा में डूब गये। आज पाण्डवों के जीवन मरण का प्रश्न उपस्थित था और तभी सहसा १६ वर्ष के कुमार अभिमन्यु ने वहां पहुँच कर निराशा की अन्धकारमयी रात्रि को आशा के अरुणोदय में परिवर्तित कर दिया।
'महाराज ! पिताजी नहीं हैं तो क्या ? उनके अंश से उत्पन्न आपका बालक अभिमन्यु तो है। मैं करूंगा चक्रव्यूह भेदन ! अपनी जान पर खेल कर भी मैं पाण्डव कुल की लाज बचाऊंगा' अभिमन्यु ने कहा।
'तुम अभिमन्यु, तुम ! नहीं बेटा, ऐसा कैसे हो सकता है। चक्रव्यूह की अभेद्य रक्षा पंक्ति में तुम्हें झोंक कर हम अर्जुन को क्या मुंह दिखायेंगे, और फिर यह साधारण युद्ध नहीं वत्स, यह चक्रव्यूह है। हममें से कोई भी तो इसका वेध करना नहीं जानता।'
'तभी तो कहता हूं महाराज ! आज मुझे व्यूहभेदन की आज्ञा दीजिए, मैंने गर्भावस्था में इस व्यूह का ज्ञान पिता जी से प्राप्त किया था। वे एक बार माताजी की तबियत बहलाने के लिये उनके सामने इसका वर्णन कर रहे थे अभी भेदन करने की रीति का वर्णन ही किया था कि माताजी को नींद आगई और पिता जी ने भी इस प्रसंग को वहीं छोड़ दिया, व्यूह भेद कर वापिस लौट आने की रीति न बता सके। तात ! इसलिये मैं वापिस तो चाहे न लौट सकूं। किन्तु व्यूह भेदन तो निःसन्देह कर सकूंगा।'—अभिमन्यु ने कहा।
और हुआ भी यही। भारतीय इतिहास के उज्ज्वल रत्न रणबांकुरे अभिमन्यु ने महाभारत युद्ध में जिस अपूर्व वीरता तथा शौर्य का प्रदर्शन किया है उसे भारत का प्रत्येक नरनारी जानता है। हमारा अभिप्राय महाभारत की कथा सुनाने का नहीं है। हम तो केवल यह दिखलाना चाहते हैं कि किस प्रकार अनेक ऐतिहासिक साक्षियें सिद्ध कर रही हैं, कि गर्भस्थ जीव के हृदय पर अच्छे, बुरे संस्कार डाले जा सकते हैं। और तब शास्त्रकारों ने इस अभिप्राय के लिए जिन संस्कारों का विधान किया वे क्या विज्ञान पर आधारित नहीं ? अस्तु
प्रस्तुत सीमन्तोन्नयन संस्कार में पर्याप्त घी मिली हुई खिचड़ी जो कि यज्ञावशिष्ट होती है—खिलाने का विधान है। गोभिल गृह्यसूत्र में लिखा है—
किं पश्यसीत्युक्त्वा प्रजामिति वाचयेत् तं सा स्वयं भुञ्जीत वीरसूर्जीवपत्नीति ब्राह्मण्यो मंगल्याभिर्वाग्भिरुपासीरन्
(गोभिल गृ० सू० २।७।९-१२)
क्या देखती हो—यह पूछने पर स्त्री कहे—सन्तान देखती हूं। उस खिचड़ी को वह स्वयं खाये, और इस शुभ संस्कार के समय एकत्रित स्त्रियें उसे यह आशीर्वाद दें—'तू वीर सन्तान उत्पन्न करनेवाली हो, तू जीवित सन्तान उत्पन्न करने वाली हो। तू चिरकाल तक सौभाग्यवती बनी रहे।'
यह विधान केवल कर्मकाण्ड का क्रिया-कलाप मात्र नहीं। इस क्रिया के द्वारा पति पत्नी का ध्यान एक विशेष आवश्यकता की ओर आकृष्ट किया जाता है। यह संस्कार जिस काल में किया जाता है, उस समय गर्भवती स्त्री को घृतादि पौष्टिक पदार्थों की बड़ी आवश्यकता होती है। अपने भोजन द्वारा इस समय एक ओर तो वह अपने शरीर का पोषण करती है दूसरी ओर उसे गर्भगत बालक का पोषण करना पड़ता है। इसलिये उसे ऐसा भोजन मिलना चाहिये जो बलवर्धक एवं पुष्टिकारक हो जिसमें अधिक से अधिक विटामिन हो, साथ ही सुपाच्य हो। खिचड़ी इसी प्रकार का सुस्वादु भोज्य पदार्थ है। इसमें मिश्रित वस्तुओं में निम्नलिखित पौष्टिक तत्त्व निम्न प्रतिशत पाए गए हैं।
प्रोटीन चिकनाई मिठास नमक पानी ताकत ४० तोले में
मूंग की दाल २३ ३ ६० ३ ११ १५६५
चावल ६½ ½ ६१ १ ११ १२४०
घी ० १०० ० ० ० ३६०५
इस प्रकार हम देखते हैं, कि खिचड़ी एक सुपाच्य किन्तु पौष्टिक तत्त्वों से परिपूर्ण वैज्ञानिक भोजन है। इसीलिये डाक्टर रोगी को पथ्य के तौर पर खिचड़ी का ही निर्देश किया करते हैं। स्त्री को चाहिये इसके बाद से इसी प्रकार के बलवर्द्धक और सुपाच्य भोजन करने का नियम बनाले जिससे उसका शरीर भी स्वस्थ रहे तथा भावि शिशु भी स्वस्थ एवं हृष्ट पुष्ट उत्पन्न हो। घृतादि के उचित मात्रा में सेवन से कब्जी आदि की शिकायत भी नहीं रहती है और प्रसव होने में विशेष कष्ट नहीं होता।
संस्कार प्रथा के लुप्त हो जाने के कारण आज गृहस्थों में स्त्री के सगर्भा हो जाने पर भी, चूंकि ऐसा कोई अवसर नहीं आता जिसमें कि पुरुष को स्त्री तथा भावि शिशु के स्वास्थ्य के लिये पौष्टिक भोजन की आवश्यकता अनुभव कराई जाय, इसलिये अधिकांश बालक इतने निर्बल उत्पन्न होते हैं, कि उनके शरीर में बाल्यावस्था में प्रथम अनुभूत होनेवाली गर्मी सर्दी को सहने की तथा तत्सम्बन्धी रोगों के कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति ही नहीं होती फलतः वे अकाल में ही मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।