दशमासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि। निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि (ऋग् ५।७८।९)

अर्थात्—हे परमात्मन्, दश मास तक माता के उदर में सोने वाला सुकुमार जीव प्राण धारण करता हुआ अपनी प्राण शक्ति सम्पन्न अर्थात् स्वस्थ माता से सुख से बाहर निकले।

उपर्युक्त संस्कार का तात्पर्य उसके नाम से ही स्पष्ट हो जाता है। जातकर्म का अर्थ है वे क्रियायें जो बच्चे के उत्पन्न होने पर की जाती हैं। यह संस्कार आज अपने स्थूल रूप में तो सर्वत्र प्रचलित दिखलाई देता है किन्तु इसका भावना संबन्धी या यों कहिये आत्मा सम्बन्धी अंश सर्वथा लुप्त हो चुका है। भारतीय ऋषियों ने न केवल इस संस्कार में किन्तु सभी संस्कारों—नहीं नहीं मनुष्य के समस्त दैनिक कार्यकलाप में भी, मनुष्य को एक अस्थि मांस निर्मित शरीर के साथ उसे आत्मवान् के रूप में देखा है। उनकी अन्तर्भेदिनी दृष्टि केवल बाह्य शरीर पर ही नहीं रुकी किन्तु उसके अन्तर में विद्यमान—'अङ्गुष्ठमात्रं हृदि शयानम्'—आदि श्रुतिवाक्यों से बोधित प्रत्यक् चैतन्य आत्मा पर भी पड़ी। उन्होंने देखा पूर्ण मानव निर्माण के लिए शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की उन्नति की परमावश्यकता है इसलिए उन्होंने दोनों ओर ध्यान दिया।

जातकर्म संस्कार की क्रियायें गृह स्वच्छता, बालक का स्नान, नाभि छेदन, दूध पिलाना आदि क्रियायें इस समय भी सभी घरों में बालक के जन्मोपरान्त की जाती हैं तथा दाई नर्स आदि महिला चिकित्सकों की सहायता से बड़ी अच्छी तरह की जाती है जिनसे जच्चा और बच्चा का शारीरिक स्वास्थ्य ठीक रहता है, किन्तु उस सद्योजात शिशु के हृदय पर, उसके कोमल मन मस्तिष्क, वाणी, आत्मा पर प्रभाव डालने के लिये आधुनिक डाक्टर वैद्यों ने क्या व्यवस्था की है ? क्या शारीरिक संस्कार की तरह उसके मानसिक तथा आध्यात्मिक संस्कार की आवश्यकता नहीं ?

जातकर्म संस्कार की यही अपनी विशेषता है। इसमें बालक को स्नान कराकर मधु स्वर्ण मिश्रित औषधि प्रदान, नालछेदन तथा मातृ स्तन पान कराकर जहां उसके शरीर को जीवन मार्ग की ओर बढ़ने के लिए सहारा दिया जाता है वहां उसके कान के पास गंभीरता पूर्वक—

अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्मांस्तेन त्वाऽऽयुष्मन्तं करोमि।

अर्थात्—जिस प्रकार अग्निदेव वनस्पतियों द्वारा आयुष्मान् है उसी प्रकार उनके अनुग्रह से मैं तुम्हें दीर्घायु युक्त करता हूं'—इत्यादि ८ मन्त्रों को जपकर तत्तत् देवताओं से उसके आयुष्य की अभ्यर्थना करके बालक के हृदय में दीर्घ जीवन की भावना को दृढ़ किया जाता है। इसी प्रकार शिशु का शरीर स्पर्श करते हुए गाई जाने वाली—

अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमश्रुतं भव। आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतम्।

अर्थात्—'हे बालक तू पत्थर की भांति दृढ़ तथा कुल्हाड़े की भांति शत्रु विनाशक हो। स्वर्ण के समान स्वच्छ तथा तेजस्वी बने। तू पुत्र नाम से मेरा ही स्वरूप है, तू सौ वर्ष तक जी'—आदि पावन ऋचायें बालक के निर्मल हृदय पर मानवोचित दृढ़ता, पराक्रम, तेज, आदि शुभ गुणों की सदा के लिए अमिट छाप छोड़ देती हैं। इससे उसकी आत्मा और मन को अपूर्व पोषण प्राप्त होता है !

प्रसवोत्पीडित जननी जब वेद के—'हे वीर स्त्री ! तू इडा है, तूने वीर पुत्र को उत्पन्न करके हमें वीर पुत्र वाला बनाया है, इस पुत्र से तू भी वीर माता बन,—आदि धैर्यप्रद शब्दों को सुनती है तो उसके हृदय में साहस का संचार हो जाता है। वह कष्ट में घबराती नहीं और उस पीड़ा को वीरमाता बनने के चाव में सहर्ष झेलती है। इस प्रकार यह संस्कार बालक के शारीरिक और मानसिक दोनों पक्षों का अभिवर्द्धन परक कहा जा सकता है।