बालक के उत्पन्न होने पर उसकी शारीरिक मशीनरी को चालू करने के लिए तत्तत् स्थानों पर जमे हुए कफ मल आदि दोषों को दूर करना आवश्यक होता है, इसके लिए चतुर दाई अंगुली में रुई लपेट कर उसके नाक कान मुख आदि को तो स्वच्छ कर देती है किन्तु प्रसव यन्त्रणा के कारण बालक की ऊर्ध्वोमुखी रक्त गति तथा तज्जन्य कफ की शान्ति के लिए बालक को अन्य उपचार की आवश्यकता पड़ती है, इसके अतिरिक्त बालक की आंतों में एक प्रकार का काला २ सा मल संचित रहता है, जिसके न निकलने से बालक को अनेक प्रकार की पीड़ायें हुआ करती हैं। इन सब बातों के उपचार के लिए आधुनिक चिकित्सक शहद मिला हुआ रेडी का तेल देने की व्यवस्था किया करते हैं किन्तु प्रयोगशालाओं में हाल ही में हुए परीक्षणों ने सिद्ध कर दिया है, कि इसके लिए शास्त्रवर्णित सुवर्णघृष्ट मधु मिश्रित घी, रेडी के तेल की अपेक्षा अधिक हितप्रद होता है। सुवर्ण से घिसे हुए इस मधु मिश्रित घी को चटाने से बालक की उपरोक्त सभी शिकायतें दूर हो जाती हैं और उसकी शारीरिक मशीनरी ठीक प्रकार से कार्य करने लग जाती है।
सुवर्ण के लिए आयुर्वेद में लिखा है कि वह वायु को उपशमन करनेवाला है, मूत्र को साफ करता है और रक्त की ऊर्ध्वगति को शान्त कर देता है। इसी प्रकार घृत, शरीर में तापवृद्धि करता है बलवर्द्धक है और विरेचक भी है। मधु के खाने से मुख में लार—जो कि पाचन शक्ति के लिए अत्यावश्यक पदार्थ है—का सञ्चार होता है, पित्त कोष सजग होता है और कफ शान्त हो जाता है।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जातकर्म संस्कार की उपयोगिता और विशेषता गर्भाधान संस्कार से कम नहीं है। प्रथम यदि 'मानव' सन्तति निर्माण के पवित्र उद्देश्य से किया हुआ बीज वपन है, तो दूसरा उठते हुए कोमल पौधे को समुचित अवलंबन द्वारा उन्नत करना। इन दोनों को ही सावधानी से करना चाहिए।