किसी पदार्थ के निर्णय में उसका नाम भी गुण अथवा अवगुण बताने का एक साधन माना जाता है। प्राचीन काल से यह प्रथा चली आती है कि किसी भी पदार्थ-विशेष या व्यक्ति-विशेष का वैसा ही नामकरण हो जो कि अधिक से अधिक सीमा तक उसके गुण अवगुणों को प्रकट करने की शक्ति रखता है। नाम रूपात्मक इस जगत् में—जहां कि नाम के द्वारा ही सम्पूर्ण व्यवहार चलता है—सभी बुद्धिमान् व्यक्ति, ग्रन्थ लेखक, कवि और वैज्ञानिक अपनी वस्तु का नाम चुनने में बहुत सोच विचार किया करते हैं और चाहा करते हैं, कि उनका सम्भावित एवं अभिलषित अर्थ उनके निर्वाचित (कम से कम अक्षरों के) नाम से अभिव्यक्त हो सके।
शायद विज्ञ पाठकों को यह बताने की आवश्यकता न हो कि हमारे पूर्वजों ने इस नामकरण शैली की प्रथा को ऐसी सुव्यवस्थित बनाने की चेष्टा की थी कि जिसे ध्यान पूर्वक देखने पर चकित सा रहना पड़ता है। रामायण महाभारत आदि सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रन्थों के चरित्र नायक, प्रतिनायक तथा अन्यान्य पात्रों तक के नाम ऐसे विलक्षण हैं, कि जो उस २ व्यक्ति के चरित्र की विशेषता को सहसा प्रकट कर देते हैं।
'राम' जहां मर्यादाओं के आदर्श पालक होने के कारण प्रत्येक प्राणी के चित्त में रमण करने वाले थे, वहां 'रावण' भी अपने अन्वर्थ गुण में कम न था, अर्थात्—प्राणी मात्र का सर्वोपरि रुलाने वाला था। युधिष्ठिर को महाभारत के युद्ध में स्थिर होना पड़ा और उसने अपनी इस स्थिरता को अनेक धर्म संकटों के अवसर में भी हाथ से न जाने दिया। दुर्योधन भी अपने नाम के अनुरूप योधन (योद्धा) तो अवश्य था परन्तु दुर-दुष्ट अन्याय युक्त युद्ध ही उसे प्रिय था। भीम के समान भयंकर और अर्जुन के समान अपने गुणों से दूसरों को अपना बनाने वाला वीर दूसरा मिलना कठिन है। द्रौपदी जैसी प्रातः स्मरणीया अबला को भरी सभा में नग्न करने में ही जिसके शासन की शान बरकरार रहती हो उससे बढ़कर 'दुश्शासन' और कौन हो सकता है।
तात्पर्य यह है कि प्राचीन समय में आर्य जाति में बहुत कुछ सोच समझ कर नामकरण करने की रीति प्रचलित थी अब भले ही हजारों विद्यासागर विद्यालंकार वेदप्रकाश नाम वाले वज्रमूर्ख मिलते हों और बहादुरसिंह नामधारी चूहों की खड़खड़ाहट को चोर की सेंध समझकर लिहाफ से मुंह ढांप लेते हों, परन्तु प्राचीन समय में 'यथा नाम तथा गुणः' सिद्धान्त पर बहुत बल दिया जाता था और ज्योतिष शास्त्र के पारंगत पुरोहित, वैज्ञानिक दृष्टि से नक्षत्र तिथि योग करण आदि के सम्मेलन से भावी गुण अवगुणों की कल्पना कर उसके अनुसार ही नामकरण किया करते थे उनकी यह कल्पना कितनी सच्ची और पूरी उतरती थी यह बात पिछले उदाहरणों से पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है।
नाम अथवा शब्द का प्रभाव बिजली से भी अधिक चमत्कारी है। प्रायः देखा जाता है जिस व्यक्ति को लोग जिस नाम से पुकारने लग जाते हैं उसमें उसी प्रकार के गुण अवगुण का सन्निवेश हो जाता है, लोगों द्वारा बार २ 'आलसी' कह कर पुकारा गया व्यक्ति जैसे कुछ दिनों बाद सचमुच आलसी बन जाता है उसी प्रकार शूरवीर के नाम से ख्याति प्राप्त व्यक्ति भी अपने नाम की लाज रखने के लिए समर भूमि में अपने प्राणों की आहुति देने में भी नहीं हिचकिचाता। अपनी नामध्वनि श्रवण के साथ ही उस नाम से सम्बद्ध यदि कोई प्राचीन चरित्र है तो निश्चय ही वह स्पष्टतया आंखों के सामने झलकने लग जाता है और मानव हृदय को एक तीव्र प्रेरणा प्रदान करता है। सती मदालसा ने—'शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि' की प्रेममयी लोरी, या यों कहिये बालक को बार २ 'तू विशुद्ध ब्रह्म है' कह २ कर आत्मज्ञानी बना दिया था।