द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषवदाद्यन्तरमन्तःस्थं दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान्न तद्धितम्। अयुजाक्षरमाकारान्तं स्त्रियै तद्धितम्। शर्म ब्राह्मणस्य वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य।
(पार० गृ० का० १ क० १७ सू० २४)
अर्थात्—पिता को चाहिये कि बालक का नाम दो या चार अक्षरों वाला रखे उसके आदि में घोष—ग घ, ज झ, ड ढ, द ध, ब भ म, य र ल व, ह, इनमें से कोई, अक्षर होना चाहिये। मध्य में अन्तस्थ य र ल व, इनमें से कोई, अन्त में दीर्घ स्वर युक्त कृदन्त नाम रखे, तद्धित नहीं। स्त्रियों के नाम तीन अक्षरों के होने चाहिएं और आकारान्त हों, यदि तद्धितान्त भी हो तो कोई हानि नहीं।
उपर्युक्त नियम कितने वैज्ञानिक एवं युक्तियुक्त हैं यह बतलाने की आवश्यकता नहीं, इन नियमों में प्रधानतया चार बातों पर बल दिया गया है।
(१) नाम के आदि में ऐसे अक्षर रक्खे जायं जिनका उच्चारण साधारण व्यक्ति भी सरलता पूर्वक कर सके। भाषा विज्ञान के अनुसार घोष इसी प्रकार की ध्वनिएं हैं जो अत्यन्त सरलता पूर्वक मुख से निकलती हैं। जन्म के अनन्तर ९० प्रतिशत बालक घोष वर्णयुक्त शब्दों के उच्चारण से ही बोलना सीखते हैं। यदि ध्यान पूर्वक पशुओं की बोलियों का अध्ययन करें तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा, कि कुछ अपवादों को छोड़ कर सभी पशु पक्षी घोषवदादि ध्वनि में ही बोलते हैं। बकरी की मैं मैं, बिल्ली की म्याऊं २, गीदड़ की ह्वां ह्वां, कुत्ते की भौं भौं, गाय भैंस की भां भां, आदि सभी पशुओं की बोलियों को देखिये, वे सब घोष अक्षर से ही प्रारम्भ हुई हैं। यों तो 'भारोपीय परिवार' की सभी भाषाओं में किन्तु विशेषकर भारतीय भाषाओं में तो अधिकांश शब्द घोष ध्वनियों से ही प्रारम्भ होते हैं। इसलिए उच्चारण की सुगमता की दृष्टि से 'घोषवदादि' नियम कितना युक्तियुक्त है यह स्वयं समझा जा सकता है।
(२) नामों को रखने में इस बात का पूर्ण विचार रखा जाय कि नाम कृदन्त हो तद्धित नहीं। कृदन्त का तात्पर्य है, धातुओं से विकार लगाकर बने हुए शब्द जैसे—आनन्द, चन्द्र, प्रकाश, राम आदि शब्द नदि, चदि, कासृ, रमु आदि धातुओं (Root) से विकृत होकर ही बने हुए हैं, इसलिए ऐसे नाम रक्खे जाएं जिनके अन्त में उपरोक्त शब्द आवें। तद्धित का तात्पर्य है—नाम अर्थात् संज्ञावाचक शब्दों से विकृत होकर बने हुए शब्द, जैसे पाण्डव, वासुदेव, भगवान्, दयालु, कृपालु, आदि शब्द,—पाण्डु, वसुदेव, भग, दया, कृपा आदि शब्दों से तद्धित प्रत्यय लगाकर बने हुए शब्द हैं। तद्धित नामों को रखने का निषेध इसलिए है कि तद्धित नाम सुस्पष्टार्थ नहीं होते और उसके प्रत्यय भी क्लिष्ट होते हैं। प्रायः तद्धित प्रत्ययों का उपयोग माता पिता के नाम को सन्तान के नाम द्वारा प्रकट करने के लिए किया जाता है।
समझ लीजिए पाण्डु नामक एक व्यक्ति है, उसके एक लड़का है जिसका नाम पाण्डव रख दिया गया, इसके बाद दूसरा, तीसरा, चौथा, यहां तक कि पांचवां भी पुत्र उत्पन्न हुआ। पाण्डव (पाण्डु का पुत्र) इस शब्द के अर्थ के अनुसार तो पांचों ही पाण्डव हुए। यदि हम किसी एक के विषय में कोई बात कहना चाहें तो हमारा इस प्रकार का नाम सर्वथा भ्रमोत्पादक ही होगा और उस व्यक्ति विशेष का बोध कराने के लिए हमें अन्य किसी विशेषण या नाम का प्रयोग करना पड़ेगा, इन सब बातों को देखकर ही तद्धित नामों का निषेध किया गया है।
(३) स्त्री के नाम में पुरुष की अपेक्षा ध्वनि में कोमलता और स्वर वैचित्र्य लाने के लिए भेद रखा गया है। इसके साथ ही यह ध्यान रखना चाहिए कि कन्याओं के नाम ऐसे नहीं रखे जाने चाहिएं जो नक्षत्र, वृक्ष, नदी, पर्वत, पक्षी, सर्पादि भयंकर वस्तुवाचक हों, क्योंकि इस प्रकार के नाम रखने में तदनुसार प्रकृति का परिवर्तन हो जाना कुछ कठिन नहीं।
(४) जन्म के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन अनिवार्य चार सामाजिक श्रेणियों के प्रदर्शन के लिए—शर्मा वर्मा गुप्त तथा दास यह चार उपाधियां अपने नाम के साथ लगानी चाहियें। इन उपाधियों के लगाने का तात्पर्य था अमुक अमुक कर्म में नैपुण्य बोध। आज लोग कर्मणा वर्णव्यवस्था का राग आलाप रहे हैं और वेदादि शास्त्रों में इस नये आविष्कार का समर्थन प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं। वेदाभिमानी होने का दावा करने वाले आर्य समाजी भी उन ही की हां में हां मिलाकर किस प्रकार स्वयं वैदिक सिद्धान्तों की हत्या कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। गृह्य सूत्र के उपरोक्त उद्धरण से भली भांति जाना जा सकता है कि वेदादि सभी शास्त्र तथा युक्तिवाद भी जन्मना वर्णव्यवस्था के ही समर्थक हैं। आर्य समाज प्रवर्तक स्वामी दयानन्द ने अपनी संस्कार विधि में पारस्करगृह्यसूत्र के उपरोक्त उद्धरण को बिना किसी ननु नच के प्रमाण रूप में स्वीकार किया है। किन्तु क्या इस उद्धरण में नामकरण संस्कार के समय ही ब्राह्मण माता पिता के रज वीर्य से उत्पन्न बालक को 'शर्मा' क्षत्रिय सन्तान को 'वर्मा', वैश्य कुलोत्पन्न को 'गुप्त' आदि विभिन्न शब्दों से सम्बोधित करने की आज्ञा नहीं दी गई है।
क्या उस सद्योजात १० दिन के शिशु के किसी कर्म को देखकर उसे शर्मा वर्मा आदि उपाधि से विभूषित किया जाता है ? वस्तुतः ऐसा नहीं है। इन उपाधियों का तात्पर्य केवल यह है कि उसके नाम के साथ जुड़े हुए इन शब्दों को देखकर प्रत्येक व्यक्ति यह समझ सके कि उसे किस कर्म में कुल परम्परागत एवं जन्म से ही नैपुण्य प्राप्त है।