यह संस्कार बालक के जन्म के अनन्तर दश रात्रि व्यतीत होने पर करना चाहिए जैसा कि—
दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति (पार० गृ० सूत्र)
—इस सूत्र द्वारा गृह्य सूत्र में बताया गया है। गोभिल गृह्यसूत्रकार ने इस विषय में तीन विकल्प रक्खे हैं, यथा—
जननाद्दशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्। (गो० गृ० सूत्र प्र० २)
अर्थात्—जन्म से ११वें दिन १००वें दिन या एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर नामकरण संस्कार करे।
दश रात्रि छोड़कर ग्यारहवें दिन के विषय में तो किसी का मतभेद नहीं है। दश रात्रि छोड़ने का अभिप्राय यह है कि सूतिका गृह में जितने लड़के लड़की मरते हैं उनमें से लगभग १० प्रतिशत पहिली दश रात्रियों में ही मर जाते हैं। इसके अतिरिक्त आयुर्वेद के मतानुसार सद्यः प्रसूता स्त्री के शरीर से दश दिन तक रक्त का प्रवाह चलता रहने से बड़ी निर्बलता रहती है। दश दिन बाद वह उठने योग्य हो जाती है। क्योंकि इस संस्कार में माता की उपस्थिति भी आवश्यक है इसलिए यह दश दिन बाद किया जाता है।
गोभिल गृह्य सूत्रकार ने जो विकल्प रक्खे हैं उनका उपयोग तब होता है जब स्त्री बड़ी निर्बल हो और दश दिन बाद तक वह बिस्तर से उठ न सके तब लगभग सवा तीन मास बाद नामकरण किया जाय। यदि पिता आदि विदेश में हों और पीछे बालक का जन्म हो तो उनके आने के समय का ख्याल करते हुए वर्ष भर की अवधि दी गई है।