शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ, शं ते सूर्य आतपतु शं वातो वातु ते हृदे। शिवा अभिक्षरन्त्वापो दिव्या पयस्वतीः। (अ० ८।२।१४)
अर्थात्—हे बालक ! तेरे निष्क्रमण काल में द्युलोक और पृथ्वी लोक कल्याणकारी सुखद एवं शोभास्पद हों। सूर्य तेरे लिए कल्याणकारी प्रकाश करे, तेरे हृदय में स्वच्छ वायु का संचार हो गंगा यमुनादि दिव्य सरिताएं तेरे लिए निर्मल और स्वादु जल का प्रवहण करें।
प्रार्थना एवं मनोज्ञ भावों से परिपूर्ण उपरोक्त मन्त्र सृष्टि में निहित जीवन के उन तत्त्वों की ओर सङ्केत कर रहा है जिनके सम्बल से मनुष्य मनुष्य बनता है। इस मन्त्र का महत्त्व उस तीन चार मास के बालक के लिए उस समय चाहे कुछ न हो किन्तु जिनके जीवन की सभी आशाएं सभी आकांक्षाएं और अभिलाषाएं उस नन्हे से बालक पर केन्द्रित हैं—उन माता पिताओं के लिए ईश्वर के इन अमोघ वरदानों का कुछ कम महत्त्व नहीं है।
इस प्रार्थनात्मक मन्त्र में सार रूप से उन सब वस्तुओं का निर्देश कर दिया गया है जो मानव जीवन के लिए परमावश्यक हैं। दुर्भाग्य से संस्कृत भाषा भारतीय जनता की भाषा से इतनी दूर हो गई है कि साधारण जनता इन वैदिक मन्त्रों में वर्णित अत्युपयोगी विषय को भी नहीं समझ सकती और हरएक काम के आरम्भ में मन्त्र पढ़ने को बाबाजी का ढकोसला समझा जाता है, किन्तु समय था जब यही मन्त्र बीमार के लिए बताये गए डाक्टर के नुस्खे से कम महत्त्व न रखते थे। लोगों का दैनिक जीवन इतना व्यस्त हो चुका है कि उनको न इन बातों को जानने की फुर्सत है न आवश्यकता। छोटी २ तङ्ग कोठरियों में जहां न सूर्य की धूप, न प्रकाश, स्वच्छ वायु का नाम नहीं, विशुद्ध जल भी जहां बड़ी कठिनता से प्राप्त होता है—अधिकांश मध्य निम्नवर्ग के लोग अपना जीवन बिताने को बाध्य होते हैं और अन्त में तपेदिक या ऐसे ही अन्य रोगों का शिकार बनकर न केवल स्वयं कष्ट भोगते हैं किन्तु अपनी भावी सन्तान को भी विरासत में उन रोगों के कीटाणु सौंप जाते हैं।
इस वैदिक मन्त्र में बतलाया गया है कि बालक ऐसे स्थान पर रहे जहां खुला आकाश हो, सूर्य का प्रकाश एवं धूप हो, शुद्ध वायु एवं स्वच्छ जल मिल सकता हो। आज निष्क्रमण संस्कार में इन बातों पर कौन ध्यान देता है, ध्यान तब दिया जाता है जब बीमार होने पर डाक्टर की जेब गरम करदी जाती है और वह कहता है—इसे खुली हवा में रखो, पानी छानकर पीने को दो, धूप में लेटाओ आदि २।
निष्क्रमण संस्कार में की जानेवाली सभी क्रियाओं का तात्पर्य बालक के स्वास्थ्य को समुन्नत करना है। यह संस्कार चौथे मास में किया जाता है जब कि बालक की ज्ञान व कर्मेन्द्रियां सशक्त और वायु धूप आदि को सहन करने योग्य हो जाती हैं। सूत्रकारों का अभिप्राय इस संस्कार से यह था कि उस दिन से बालक को प्रति दिन थोड़ा २ टहलाया जाय, उसे सूर्य स्नान कराया जाए जिससे उसके शरीर से सर्दी गर्मी को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो और वह दृढ़ तथा निरोग बन सके।
इस संस्कार के रूढ़िगत नहीं, किन्तु उपरोक्त मुख्य उद्देश्य पर जितना अमल विदेशों में होता है उतना भारत में नहीं। जब हम अंग्रेज माताओं को छोटे २ बालकों को गाड़ियों में लिए विशुद्ध वायु में टहलाते देखते हैं तो—'शं वातो वातु ते हृदे' की साकार व्याख्या कानों में गूंजने लगती है।
इस संस्कार की मुख्य क्रियाओं—सूर्यप्रदर्शन देवदर्शन एवं रात्रि में चन्द्र दर्शन का अभिप्राय, जगत्प्राण प्रेरक सूर्य एवं मनाधिष्ठातृ चन्द्रमा से जीवन शक्ति की प्रार्थना के साथ २ बालक के हृदय में प्राकृतिक पदार्थों के प्रति स्नेह उत्पन्न करना है। तथा माता पिता को भी एक प्रकार की शिक्षा है कि वे बालक को घर में घोटकर न रक्खें किन्तु उसे उन्मुक्त नभ के नीचे खुली वायु में श्वास लेने दें।